शनिवार, 6 नवंबर 2010

मेरा शहर

-ग़ज़ल-
                           सुनील सक्सेना

अब परिंदे भी डरते हैं मेरे शहर में आने से
बसेरा उनका भी कल जला गया कोई


जिन हाथों में हुआ करती थी गीता कुरान
उन हाथों में खंजर थमा गया कोई


जो दोस्त रहा ताउम्र मेरा
सबक उसे दुश्मनी का सिखा गया कोई


बड़ा ही पुरसुकून अक़ीदतमंद मसीहा था
वो मेरे शहर का
कल सूली पर उसे लटका गया कोई


उसके आने तक अमन चैन था मेरे शहर में
वो गया और फिज़ा बिगाड़ गया कोई


अब कौन करेगा यकीन तेरे वादों पर
जिसका ईमान धर्म से न हो नाता कोई.