"दाना"

कहानी, व्यंग्य, और कविताओं के इस ब्लॉग में आपका स्वागत है । यहां आपको पौष्टिक बौद्धिक खुराक देने का मेरा प्रयास रहेगा । “दानारा” यक इशारा काफियस्त‍” फारसी में कहा है और हिंदी में “अक्लमंद को एक इशारा ही काफी है” । मेरी रचनाएं भी आप जैसे दानिशमंद पाठकों के लिए “इशारा” मात्र हैं । आनंद लें । अपनी प्रतिक्रिया से अवगत करायें ये मेरी बेहतरी के लिए ये बेहद जरूरी है ।

बुधवार, 9 सितंबर 2020

व्‍यंग्‍य - दर्दे सिर की दवा है चश्‍मा

 


व्‍यंग्‍य

दर्दे सिर की दवा है चश्‍मा  

-: सुनील सक्‍सेना

                               मैं पिछले कुछ दिनों से सर्वव्‍यापी, सार्वभौमिक, समधर्मी,  हर आयु वर्ग में लोकप्रिय रोग सिरदर्द की चपेट में हूं । दर्दे सिर जाने का नाम नहीं ले रहा है । बीमारी और समस्‍या इनकी तासीर में एक समानता है, दोनों का अगर समय रहते इलाज नहीं किया तो नासूर बनते देर नहीं लगती ।

दुर्भाग्‍य से हमारे फेमली डॉक्‍टर लॉकडाउन में फंसे हैं । मैंने उनकी फोन पर नि:शुल्‍क सेवा भी ली, किंतु कोई राहत नहीं मिली । फीस के मामले में फेमली डॉक्‍टर तुलनात्‍क रूप से भले होते हैं । फेमली डॉक्‍टर आहिस्‍ता-आहिस्‍ता, बड़े प्‍यार से आपकी जेब “हलाल” करता है ।  परंतु जब मजबूरी में किसी दूसरे डॉक्‍टर के पास जाना पड़े तो वो “झटका” विधि का प्रयोग करते हुए  एक ही बार में सारे अरमान पूरे कर लेता है । उसे पता होता है कि बंदा दोबारा उसकी गली में फटकने वाला नहीं है । तो मैं सिरदर्द की असहनीय पीड़ा से मुक्ति पाने के लिए “झटके” वाले इलाज हेतु सज हो गया ।

मैं जिस नये डॉक्‍टर  के पास गया, वे शहर के पुराने उम्रदराज डॉक्‍टर हैं,  लोग उन्‍हें अनुभवी मानते हैं । वैसे सच पूछिए तो उम्र और अनुभव का कोई ताल्‍लुक नहीं हैं । ये भ्रम है कि उम्र के साथ तजुर्बा बढ़ता है । ठीक वैसे ही जैसे जिनका हाजमा खराब रहता है वो ये मानते हैं कि शौच क्रिया से पहले “धूम्रपान” करने या “जर्दा” खाने से “प्रेशर” अच्‍छा  बनता है । लेकिन हां, आदमी उम्रदराज और एक्‍सपीरिएन्‍सड दोनों हो तो बड़ा “डेडली कॉम्‍बीनेशन” हो जाता है । जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, इंसान की मासूमियत खत्‍म होती जाती है । वो खब्‍ती और उज्‍जड टाइप का हो जाता है । अदब की रवायतें भूलने लगता है । स्‍वयं को “नरेन्‍द्र” समझने लगता है ।

ये डॉक्‍टर हमारे इलाके में शर्तिया और अचूक इलाज के साथ-साथ, सनकीपन के लिए भी जाने जाते हैं । रोगी के परीक्षण के दौरान जब तक रोगी की मां-बहन को एकाध बार याद न कर लें, पर्चे पर दवाई नहीं लिखते । कभी किसी मरीज ने जरा चूं-चपड़ की तो एकाध धौल भी जमा देते हैं । उनकी इन अघोरी बाबा टाइप की हरकतों की वजह से लोग कहते हैं कि उनके शरीर में किसी पीर-फकीर की आत्‍मा निवास करती है । वे जितना मरीज को गलियाते हैं, दवाई उतनी ज्‍यादा असर करती है । मरीज जल्‍दी भला चंगा हो जाता है ।

मैं जब केबिन में घुसा तो डॉक्‍टर साब कुछ बुदबुदा रहे थे । शायद जो मरीज अभी केबिन से निकला था, उसकी शान में कुछ शब्‍द शेष रह गये थे । मुझसे बोले - “क्‍या तकलीफ है ?”  

मैंने कहा – “ पिछले तीन-चार दिन से सिर में दर्द है । ठीक ही नहीं हो रहा है । सब उपाय कर लिये ।  फेसबुक बंद । इन्‍स्‍टाग्राम बंद । व्‍हाटसएप बंद । टीवी न्‍यूज बंद । सीरियल बंद । बीवी से चिक-चिक बंद । बच्‍चों से पिट-पिट बंद । यानी मैंने स्‍वयं को दुनिया जहान से कट कर लिया है,  फिर भी ढीठ सिरदर्द बना हुआ है । अब तो ऐसा लगता है सिर फट जायेगा ।”

डॉक्‍टर साब ने मेरी नब्‍ज पर हाथ रखा और बोले – “आप सोचते ज्‍यादा हैं..”

मैंने कहा - “अब संसार  है,  चिंताएं तो लगी रहती हैं…”

डॉक्‍टर साब “आप” से “तुम” पर आगये कहने लगे – “अब ऐसा है ये फिलॉसफी तुम हम पे न पेलो । अपनी नाक पोंछी नहीं जा रही तुमसे,  दूसरों के आंसू पोंछने चले हैं । वैसे आप करते क्‍या हैं ?”

“जी.. थोड़ा बहुत लिखता हूं ।” मैंने सकुचाते हुए कहा ।

“लेखक हैं..”

“जी..”

“तो शरमा क्‍यों रहे हैं । बोलिए न सीना ठोक के कि लेखक हैं । ये स्‍साला आप लेखक लोगों के साथ यही प्रॉब्‍लम है, फिजूल में सोचने की बीमारी पाल लेते हैं ।” डॉक्‍टर साब के मुंह से “स्‍साले” शब्‍द के साथ रिश्‍तेदारियों की रागदारी शुरू हो गई ।

“मैं लेखक हूं । सोचना मेरा धर्म है । मैं साहित्‍य नहीं रचूंगा तो दर्पण कैसे बनेगा । दर्पण नहीं होगा तो समाज अपना चेहरा कैसे देखेगा ?” मैंने लेखक के समाज के प्रति दायित्‍व को समझाने का प्रयास किया ।     

डॉक्‍टर ने मेरी नब्‍ज को जोर से दबाया । मुझे दर्द हुआ । वे  मेरे लेखत्‍व को खारिज करते हुए बोले - “ये तुम्‍हारा लेखन, साहित्‍य, दर्पण, परिवर्तन, क्रांति सब बेकार की बातें हैं । बकवास है । फालतू सोचना-वोचना छोडि़ये । अच्‍छी गिजा लीजिए । कसरत करिये । सुबह सैर पर जाइये । अपना ध्‍यान रखिए । परिवार का ख्‍याल रखिए ।”

इतना कहकर वे मेरी आंखों में झांकने लगे । थोड़ा ठहरकर बोले – “आपके  सिरदर्द का कारण आपकी आंखें हैं ।”

मुझे झटका लगा । मैंने कहा – “मेरी नजर तो बिल्‍कुल ठीक है । आज तक कभी कोई परेशानी नहीं हुई देखने में ।  पास का,  दूर का सब साफ दिखाई  देता है ।”   

“यही तो…यही आपकी बीमारी है । जिसे आप साफ स्‍पष्‍ट, उजला कह रह हैं,  दरअसल वो वैसा नहीं है । जो जैसा है, वो आपको दिखता नहीं है । यही आपके रोग की जड़ है ।”

“तो इसका कोई इलाज ?”

“है न.. चश्‍मा”

सिरदर्द का इलाज चश्‍मा । मैं सोच में पड़ गया । मर्ज है सिर का । खराबी है आंखों में । दवा है चश्‍मा । क्‍या अजब-गजब बीमारी है । बिल्‍कुल मेरे मादरे वतन के मौजूदा हालात की तरह । बीमारी कुछ है, इलाज कुछ हो रहा है । रोग जस का तस । रोगी बेचारा पिसा जा रहा है ।

 डॉक्‍टर  अपनी फितरत के विपरीत मेरी फिरकी लेने लगे – “क्‍या सोच रहे हैं ? अरे ! बिना चश्‍मे के लेखक, लेखक नहीं लगता । जितनी पावर का चश्‍मा, उतना बड़ा लेखक । आप चश्‍मा लगाकर तो देखिए । दुनिया को देखने की आपकी दृष्टि बदल जायेगी ।”

मैं डॉक्‍टर साब की सलाह मानने को विवश था । डॉक्‍टर भगवान का रूप होते हैं । भगवान कभी झूठ नहीं बोलते । लिहाजा मैं उनके बताये हुए नेत्र रोग विशेषज्ञ के पास चला गया ।

नेत्र विशेषज्ञ ने मेरी उम्र पूछी और आश्‍चर्य से कहा -  “कमाल है.. आपको अभी तक चश्‍मा नहीं लगा ? बड़ा जुल्‍म किया है आपने अपनी आंखों के साथ । अच्‍छा हुआ समय रहते मेरे पास आ गये । कुछ दिन और लापरवाही करते तो आपकी आंखों की रोशनी जा सकती थी । ये लीजिए चश्‍मा । अब आज से ये ही आपकी आंखें हैं ।”  

जब कोई विकल्‍प न हो तो एक ही विकल्‍प होता है, सहमती का । चश्‍मे से कुछ दिनों तक चीजें साफ, बेदाग नजर आईं । फिर धुंधला दिखाई देने लगा । डॉक्‍टर के पास जाता हूं । वो हर बार चश्‍मे का नंबर बढ़ा देता है । मेरे चश्‍मे की फ्रेम वही है, नंबर बढ़ते जा रहे हैं । कई बार सोचता हूं,  बगैर चश्‍मे के ही ठीक था । सिरदर्द ही तो है । इतने दिनों सहा, आगे भी सह लेता । सिरदर्द से भला मरा है कोई ?  पर आंखों की रोशनी चली जाने वाली बात जो डॉक्‍टर ने कही थी,  उससे मैं डर जाता हूं । मैं अंधा होना नहीं चाहता ।  मैं अब चौबीस घंटे चश्‍मा पहनता हूं । विश्‍वास करिए सोते वक्‍त भी चश्‍मा नहीं उतारता । पर सिरदर्द का मर्ज बरकरार है ।

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प्रस्तुतकर्ता Sunil "Dana" पर 11:54 am 3 टिप्‍पणियां:
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सोमवार, 31 अगस्त 2020

व्‍यंग्‍य - “मैं दीये जलाता कैसे”

 


व्‍यंग्‍य

“मैं दीये जलाता कैसे”

-: सुनील सक्‍सेना

        मैं  हर दिन की तरह सुबह जब परिंदों को पीने के लिए पानी रखने छत पर आया तो देखा वे सूर्य देवता को अर्घ्‍य दे रहे थे । मैं मिट्टी के कटोरे  में पक्षियों की प्‍यास बुझाने के लिए पानी रखता हूं, वे रोज लोटा भर पानी छत पर बहाकर सूरज को अर्पित कर देते हैं ।

 उनका मानना है कि सदकर्म का प्रतिफल लेना ही है,  तो वाया-वाया जाने की क्‍या जरूरत है । सीधे देने वाले से सम्‍पर्क करो और मांग लो । वे डायरेक्‍ट डीलिंग में यकीन रखते हैं । इसलिए जब भी मैं बेजुबान पक्षियों के लिए पानी लेकर छत पर आता हूं तो वे मुझे उपहास भरे अंदाज में देखते हैं । ऐसा लगता है, जैसे वो मुझसे कह रहे हों “बेवकूफ इंसान इन चिडि़यों, कबूतरों को पानी पिलाने से कुछ नहीं होने वाला, प्‍यास बुझानी है तो उस ऊपरवाले की बुझा, जहां से कृपा बरसने वाली है ।”

हमारी और उनकी छत से छत मिली है, पर विचार नहीं मिलते हैं । हमारे वैचारिक मतभेद हैं । मेरा दर्शन और उनका शास्‍त्र मेल नहीं खाता । सही कहते हैं, दोस्‍त बदले जा सकते हैं, पर पड़ोसी नहीं । सो मैं पड़ोसी धर्म निभा रहा हूं ।

यूं तो हमारी राम-राम उनसे रोज होती थी । वे कुशलक्षेम भी पूछते थे । किंतु पिछले कुछ दिनों से नमस्‍कार-चमत्‍कार एकदम बंद है । पड़ोसी से अबोला या अनबन ज्‍यादा दिनों तक लंबी खिंच जाये, तो ठीक नहीं है । दोनों पक्षों में तनाव बढ़ जाता है । सियासत शुरू हो जाती है ।

मैं सोच रहा था कि मुझसे उनकी शान में क्‍या गुस्‍ताखी हो गई ? मैंने ऐसी कौनसी वादा खिलाफी कर दी कि वे ऐसे रूठे हुए हैं, जैसे किसी शोख-चंचल हसीना को किये वादे को पूरा न करने पर,  वो रूठ जाती है ।

मैंने पिछले दिनों उनके साथ बिताये पल, मुलाकातों को रिवाइंड किया तो पता चला जिस दिन “लला” के नए घर का भूमि पूजन हुआ था, उसके दूसरे दिन से ही वे रूसा गये हैं ।  

उन्‍हें गुड मॉर्निंग, नमस्‍कार या नमस्‍ते की अपेक्षा राम-राम ज्‍यादा अच्‍छा लगता है, सो जब वे अर्घ्‍य देकर फारिग हुए तो मैंने कहा -  “राम राम भाई साब… कैसे हैं ?”

“ठीक हूं ।” वे बोले

इतने संक्षिप्‍त उत्‍तर की मुझे अपेक्षा नहीं थी । मुझे लगा शायद “ठीक हूं” कहने के बाद वे पूछेंगे – “आप कैसे हैं ?”  पर उनके मुख्‍तसर जवाब से मैं समझ गया था कि हो न हो,  उन्‍हें मेरे किसी कृत्‍य से बहुत गहरी चोट पहुंची है । मुझे इस चुप्‍पी के रहस्‍य की तह तक पहुंचना था ।

मैंने सीधे-सीधे पूछ ही लिया - “लगता है आप नाराज हैं हमसे ? आजकल बात ही नहीं करते ठीक से । हां.. हूं.. में जवाब देकर खामोश हो जाते हैं आप ।”

वे थोड़ा सा खुले । “नाराजगी की बात ही है । उस दिन “लला” के नये आवास का भूमि पूजन हुआ । आपने रात में दीये क्‍यों नहीं जलाये ? न पटाखे चलाये..।”

मेरी ओर ये प्रश्‍न दागते ही उन्‍हें बड़ी रिलीफ मिली । बिल्‍कुल वैसी रिलीफ जब किसी बंदे को सिनेमा हॉल में घंटे भर से रोकी हुई लघुशंका को इंटरवेल में रिलीज करने पर मिलती है । 

“ओह !  तो इस बात को लेकर आप गुस्‍सा हैं । बस भाई साब,  उस दिन कुछ  मन ही नहीं हुआ ये सब करने का ।” मैंने उनके प्रश्‍न को टालते हुए कहा ।

वे बोले – “इससे पहले तो आपने जनता कर्फ्यू में हिस्‍सा लिया । एक दिन थाली, घंटी, शंख बजाये । नौ-नौ दीप भी जलाये । ये तो उससे भी बड़ा अवसर था, कितने संघर्ष के बाद “लला” को नया घर मिलने जा रहा है ।”   

मुझे ऐसा लगा जैसे वो स्‍वयं को “लला” का परमभक्‍त और सच्‍चा राष्‍ट्रवादी प्रतिपादित कर रहे हैं, और मेरी ईश्‍वर के प्रति निष्‍ठा को चुनौती देते रहे हैं  ।  

मैंने कहा – “भाई साब बड़ी मुश्किल से तो आपका मौन टूटा है । मैं कुछ कहूंगा तो आप फिर बुरा मान जायेंगे ।”

वे बोले- “नहीं..नहीं कहिए”  

मैंने भी सोचा सच कहने में डर कैसा । मुझे कौनसी बिटिया बिहानी है, उनके यहां ।  इसी बीच अचानक मुझे मुंशी प्रेमचंद की कहानी का संवाद भी याद आ गया “बिगाड़ के डर से ईमान की बात नहीं कहोगे ।”

मैंने कहा- “ऐसा है भाई साब, आप जिस दुनिया में रहते हैं न वो बड़ी छोटी है । आपका दौलतखाना और विरासत में मिला पुश्‍तैनी धंधा, इसके आगे आपने संसार में कुछ देखा ही नहीं ।”  

वे भड़क गये, बोले - “दुनियादारी की बात आप हमसे न करिये… आप क्‍या जाने बिजनेस क्‍या होता है । यहां रोज सैकड़ों से पाला पड़ता है । आपकी तरह दस से पांच की नौकरी नहीं करते हैं ।”

मैं भी दो-दो हाथ करने के मूड में था । मैंने कहा – “आरोग्‍य सेतु एप देखे हैं कभी । छोडिये, आप तो स्‍मार्ट फोन रखते ही नहीं है । आप क्‍या जानें । आपको मालूम है हमारी कॉलोनी में दस कोरोना पॉजिटिव हो गये हैं । चार घरों को सील कर दिया है । शहर में कितनों के मां, बाप, बच्‍चे अस्‍पताल में हैं । किसी को पता नहीं, जियेंगे या मरेंगे । हर पल मौत का डर ।  दहशत में जी रहे हैं ।

वो अपने शर्मा जी की कामवाली विमला, उसका आदमी दो महीने हो गये मुम्‍बई से चला था,  आज तक घर नहीं पहुंचा । पता नहीं जिंदा है या मर गया । विमला रोज उसके नाम का सिंदूर मांग में भरती है,  इस उम्‍मीद से कि उसका आदमी लौटकर आयेगा ।

गुप्‍ता के लड़के की नौकरी चली गई । इकलौता कमाने वाला था घर में । खाने के लाले पड़ रहे हैं ।

राधेश्‍याम तिवारी दो महीने पहले रिटायर हुए थे, उनकी की पेंशन सरकार ने रोक दी । तनख्‍वाह बंद । पता नहीं पेंशन मिलेगी भी या नहीं,  ये सोच-सोच कर वो डिप्रेशन में चले गये ।

बंसल ने बेटे को बेंक से लोन लेकर दुकान खुलवाई । उदघाटन के दूसरे दिन से दूकान बंद पड़ी है, लॉकडाउन के चक्‍कर में । आमदानी बंद । बैंक लोन की किश्‍तें चालू हैं । किस-किस का दर्द बयां करूं मैं आपको ।

            इतनी दुश्‍वारियों के बीच किसका मन करेगा उत्‍सव मनाने का । भाई साब आप ही बताओ कोई कैसे दीप जलाये ।

उन्‍होंने अपने कान की दोनों लौ को छुआ, हल्‍की सी जबान बाहर निकाली आसमान की ओर देखा और चले गये ।  पता नहीं वो ऊपरवाले से किसके लिए माफी मांग रहे थे । मेरे लिए या स्‍वयं अपने लिए ।

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