मधुरिमा मे प्रकाशित मेरा नया व्यंग्य
होली है भई होली है बुरा न मानो होली है । अपन ने तो पिछली होली पर भी बुरा
नहीं माना था । जब हुरियारे होली है.. होली है.. बुरा न मानो होली है चिल्लाते हुए
ढोल—ढमाके के साथ अपने घर आ
धमके थे । अपने ने सोचा भई किस बात का बुरा मानें ? गुलाल तुम्हारा, रंग तुम्हारा, पेट्रोल जलाकार तुम हमारे घर आये और अगर अपने इस श्यामवर्ण
थोबड़े पर, जिस पर कोई रंग नहीं चढ़ता, आप रंग पोतना भी
चाहें तो अपना कोई नैतिक अधिकार नहीं बनता कि अपन बुरा मानें ।
वैसे भी आजकल अपन ने
बुरा मानना छोड़ दिया है । होली क्या कोई भी त्यौहार हो, दिवाली हो, दशहरा हो, रक्षाबंधन
हो अपन को आजकल बिल्कुल बुरा नहीं लगता ।
किस—किस बात का बुरा माने ?
कमब्ख्त हर दिन कोई न कोई बुरी खबर लेकर
ही आता है । कभी नेताओं के भ्रष्टाचार की खबर, कभी भूख से दम तोड़ता आम आदमी, तो कभी कर्ज के
बोझ तले आत्महत्या करता किसान, तो कहीं पढ़ाई में अव्वल आने के दबाव से
आत्महत्या करते हुए छात्र । हर घटना बुरा लगने वाली ही होती है । तय कर
पाना कठिन हो जाता है कि आप किस बात का
बुरा मानें किस बात का नहीं । किस बात पर हंसे और किस बात पर रोयें । हर दिन बस
इसी आस में गुजर जाता है कि कभी तो कहीं से
कोई अच्छी खबर आये । दिल को सुकून मिले ।
रोज-रोज की इन मनहुसियत
भरी खबरों को सुनकर-सुनकर अपन ने तो बुरा लगने की आदत को ही तिलांजली देना
मुनासिब समझा । जब हफते में पांच-पांच दिन नल नहीं आते और दिन—दिन भर पॉवर कट के नाम पर मंत्रियों के बंगले
रोशन रहते हैं, अपन को तब भी
बुरा नहीं लगता । पेट्रोल महंगा हुआ,
गैस महंगी हुई, पढा़ई महंगी हुई, जीना महंगा हुआ हमने कभी बुरा नहीं माना । संसद पर हमला हुआ, संसद में जूतम पैजार हुई, नेताओं पर जूते फिके, चांटे पड़े, चपरासी के
घर लाखों और अफसर के घर से करोड़ों में काला धन मिला, अपन ने बुरा नहीं माना। अरे ! जब हमारे रहनुमा ही सारी शर्मोहया को घोंटकर पी गये हों
तो अपन किस बात का बुरा मानें ? अपन भी मोटी चमडीवालों में
शरीक हो गये हैं ।
लेकिन हां ! अब जिस दिन कोई
बुरी खबर सुनने को नहीं मिलती उस दिन जरूर बुरा लगता है । वैसे भी हम आम हैं खास
नहीं । हमारे बुरा मानने या न मानने से किसे क्या फर्क पड़ता है ? अपनी औकात ही क्या है कि अपन बुरा मानें । हमको बुरा लगा करे तो लगे उनके
ठेंगे से ।
तो भाइयों ! समय का तकाजा है
। होली भी है । होली के रंगों में डूब जायें और भंग की तरंग हम
भी बोलें बुरा न मानो होली है ।
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-:सुनील सक्सेना
