सोमवार, 28 मार्च 2011

व्यंग्य ‘अतिथि कोटा भवः‘

आमतौर पर खुजली को चर्मरोग विशेषज्ञ रोग नहीं मानते हैं। क्योंकि खुजली किसी को भी कहीं भी, किसी भी समय हो सकती है खुजली बड़ी ही संत प्रकृति की होती है खुजली जातिपात देखे, देशकाल और ही राजारंक में कोई भेदभाव करती है बस ज़रूरत सिर्फ एक चीज़ की है कि आपको खुजली मचना चाहिए जो बेचारे हैं, वो अपनी खुजली स्वयं मिटा लेते
हैं जो सक्षम हैं, वे खुजियाने के लिए लोग रख लेते हैं जब खुजली मची, अंग आगे कर दिया ले बेटा.. मचा खुजली ऐसे ही सत्ता गलियारे में बैठे निठल्ले चिंतकों को जब कोई काम नहीं सूझता है तो उन्हें भी खुजली होने लगती है इन चिंतकों का मानना है कि खुजली की कोख से ही नए 'आडियाज' उत्पन्न होते हैं मतलब जब तक आपको खुजली नहीं होगी, नए 'आडियाज' नहीं आएंगे और अगर नए 'आडियाज' नहीं आएंगे तो आपका चिंतक होना व्यर्थ है आपकी रोजीरोटी ख़तरे में
जब देश के तमाम गोदामों में रखा अन्न सड़ने लगा खाद्य मंत्री देश की जनता पेटू कहने लगे मंत्री किसानों की आत्महत्या को कर्मों का फल बताने लगे सरकार की थूथू और जगहसाई होने लगी तब एक चिंतक को खुजली मची एक आइडिए ने जन्म लिया पहुंच गये आडिया लेकर 'सर, अन्न का सड़ना इतना चिंता का विषय नहीं है जितना अन्न के अपव्यय को रोकना मेरे पास कम्पलीट डाटा है, सर। शादी, पार्टियों समारोहों में आयोजित होने वाले भोज में खाने की सबसे ज्यादा बरबादी होती है सबसे पहले इसकी रोकथाम होना जरूरी है मेरे हिसाब से सर, शादी पार्टियों में आयोजित होने वाले भोज में मेहमानों का 'कोटा' फिक्स कर देना चाहिए इससे अन्न की बचत तो होगी ही, हमें भी अपनी नाकामियों का ठीकरा दूसरों के सिर पर फोड़ने का सुअवसर मिल जायेगा कितना फेंटास्टिक आडिया है सर जी?' चिंतक के आइडिये को अमली जामा पहनाने में जुट गई सरकार खाने की बरबादी को रोकने के लिए खाद्य सुरक्षा विधेयक लाया जायेगा अब सरकार को कौन समझाए कि आज भी शादियों में बचने वाला खाना, समारोह स्थल के बाहर खड़े भूखे बच्चे पॉलिथीन में भरकर ले जाते हैं वो झूठन में ही खोजते हैं शाही व्यंजनों का स्वाद।
कोटा राज और उससे उपजे संकट से सरकारें कई बार दोचार हो चुकी हैं बावजूद इसके सरकार का दिल है कि मानता नहीं कोटे और आरक्षण की राजनीति से परे देख पाना उसकी नियती बन गई है जिस दिन से इस कानून बनने की सुगबुगाहट शुरू हुई है, खाद्य विभाग का अमला प्रफुल्लित है लो भई एक और कोटा लायसेंस जारी करने का अधिकार मिला एक और कमाई का जरिया खुला। शादी है ? हजार लोगों को दावत में बुलाना है ? तो पहले यह साबित करो कि तुम्हारी औक़ात हजार आदमी को खिलाने की है कि नहीं ? अगर पांच सौ को खिलाने की है, तो हम बढ़ाये देते हैं खिलाने की लिमिट। लेकिन उसका अलग से सेवाशुल्क लगेगा
अगर आप खुद इन पचड़ों में नहीं पड़ना चाहते हैं तो बिचौलियों का बाजार सक्रिय हो जायेगा भोज समारोह में केटरर्स की भूमिका सिर्फ खाना बनाने तलक ही सीमित नहीं होगी उसके अपने कॉटेक्टस होंगे। खाद्य विभाग में उसकी जुगाड़ भी होगी सौ-पचास अतिथियों की बैकडोर एंट्री करवा देना तो उसके बांये हाथ का खेल होगा
लड़की के लुटापिटे बाप का बचाखुचा ख़ून गेस्ट की लिस्ट बनाने में निचुड़ जायेगा मामाजी बीमार हैं आऐंगे या नहीं ? लिस्ट में जोड़ूं या नहीं ? कहीं गये तो एप्रूव्ड कोटे से नंबर बढ़ जायेगा और ऐसे में खाद्य विभाग का अमला कहीं चेकिंग के लिए धमका तो फजीहत अलग बेचारे की
दोनों तरफ से मरन गेस्ट की संख्या एप्रूव्ड कोटे से कम है तो भी मरना है। क्योंकि खाना बरबदा हुआ जुर्माना भरो और मेहमान ज्यादा हो गये तो भी आप फंसे मतलब दोनों ही स्थितियों में लड़की का बाप गया चूल्हें में और खाद्य विभाग की चकाचक
अब ये चिंतक क्या जानें कि उनकी खुजली से उत्पन्न इस आडिये से बाद की होने वाली पीड़ा को आमजन को ही सहना करना है तुम्हारा क्या है, तुम्हारे लिए अतिथिदेवो भवःतबअतिथि कोटा भवःहो जायेगा सरकार के सीने पर ग़रीबों के हमदर्द होने का एक तमगा और लग जायेगा
-: सुनील सक्सेना

पत्रिका में दिनांक २८.०३.२०११ को प्रकाशित व्यंग्य