आमतौर पर खुजली को चर्मरोग विशेषज्ञ रोग नहीं मानते हैं। क्योंकि खुजली किसी को भी कहीं भी, किसी भी समय हो सकती है । खुजली बड़ी ही संत प्रकृति की होती है । खुजली न जाति—पात देखे, न देश—काल और न ही राजा—रंक में कोई भेदभाव करती है । बस ज़रूरत सिर्फ एक चीज़ की है कि आपको खुजली मचना चाहिए । जो बेचारे हैं, वो अपनी खुजली स्वयं मिटा लेते
हैं । जो सक्षम हैं, वे खुजियाने के लिए लोग रख लेते हैं । जब खुजली मची, अंग आगे कर दिया । ले बेटा.. मचा खुजली । ऐसे ही सत्ता गलियारे में बैठे निठल्ले चिंतकों को जब कोई काम नहीं सूझता है तो उन्हें भी खुजली होने लगती है । इन चिंतकों का मानना है कि खुजली की कोख से ही नए 'आडियाज' उत्पन्न होते हैं । मतलब जब तक आपको खुजली नहीं होगी, नए 'आडियाज' नहीं आएंगे और अगर नए 'आडियाज' नहीं आएंगे तो आपका चिंतक होना व्यर्थ है । आपकी रोजी—रोटी ख़तरे में ।
जब देश के तमाम गोदामों में रखा अन्न सड़ने लगा । खाद्य मंत्री देश की जनता पेटू कहने लगे । मंत्री किसानों की आत्महत्या को कर्मों का फल बताने लगे । सरकार की थू—थू और जगहसाई होने लगी तब एक चिंतक को खुजली मची । एक आइडिए ने जन्म लिया । पहुंच गये आडिया लेकर । 'सर, अन्न का सड़ना इतना चिंता का विषय नहीं है जितना अन्न के अपव्यय को रोकना । मेरे पास कम्पलीट डाटा है, सर। शादी, पार्टियों व समारोहों में आयोजित होने वाले भोज में खाने की सबसे ज्यादा बरबादी होती है । सबसे पहले इसकी रोकथाम होना जरूरी है । मेरे हिसाब से सर, शादी पार्टियों में आयोजित होने वाले भोज में मेहमानों का 'कोटा' फिक्स कर देना चाहिए । इससे अन्न की बचत तो होगी ही, हमें भी अपनी नाकामियों का ठीकरा दूसरों के सिर पर फोड़ने का सुअवसर मिल जायेगा । कितना फेंटास्टिक आडिया है न सर जी?' चिंतक के आइडिये को अमली जामा पहनाने में जुट गई सरकार । खाने की बरबादी को रोकने के लिए खाद्य सुरक्षा विधेयक लाया जायेगा । अब सरकार को कौन समझाए कि आज भी शादियों में बचने वाला खाना, समारोह स्थल के बाहर खड़े भूखे बच्चे पॉलिथीन में भरकर ले जाते हैं । वो झूठन में ही खोजते हैं शाही व्यंजनों का स्वाद।
कोटा राज और उससे उपजे संकट से सरकारें कई बार दो—चार हो चुकी हैं । बावजूद इसके सरकार का दिल है कि मानता नहीं । कोटे और आरक्षण की राजनीति से परे न देख पाना उसकी नियती बन गई है । जिस दिन से इस कानून बनने की सुगबुगाहट शुरू हुई है, खाद्य विभाग का अमला प्रफुल्लित है । लो भई एक और कोटा लायसेंस जारी करने का अधिकार मिला । एक और कमाई का जरिया खुला। शादी है ? हजार लोगों को दावत में बुलाना है ? तो पहले यह साबित करो कि तुम्हारी औक़ात हजार आदमी को खिलाने की है कि नहीं ? अगर पांच सौ को खिलाने की है, तो हम बढ़ाये देते हैं खिलाने की लिमिट। लेकिन उसका अलग से सेवाशुल्क लगेगा ।
अगर आप खुद इन पचड़ों में नहीं पड़ना चाहते हैं तो बिचौलियों का बाजार सक्रिय हो जायेगा । भोज समारोह में केटरर्स की भूमिका सिर्फ खाना बनाने तलक ही सीमित नहीं होगी । उसके अपने कॉटेक्टस होंगे। खाद्य विभाग में उसकी जुगाड़ भी होगी । सौ-पचास अतिथियों की बैकडोर एंट्री करवा देना तो उसके बांये हाथ का खेल होगा ।
लड़की के लुटापिटे बाप का बचाखुचा ख़ून गेस्ट की लिस्ट बनाने में निचुड़ जायेगा । मामाजी बीमार हैं । आऐंगे या नहीं ? लिस्ट में जोड़ूं या नहीं ? कहीं आ गये तो एप्रूव्ड कोटे से नंबर बढ़ जायेगा । और ऐसे में खाद्य विभाग का अमला कहीं चेकिंग के लिए आ धमका तो फजीहत अलग । बेचारे की
दोनों तरफ से मरन । गेस्ट की संख्या एप्रूव्ड कोटे से कम है तो भी मरना है। क्योंकि खाना बरबदा हुआ । जुर्माना भरो । और मेहमान ज्यादा हो गये । तो भी आप फंसे । मतलब दोनों ही स्थितियों में लड़की का बाप गया चूल्हें में और खाद्य विभाग की चकाचक ।
अब ये चिंतक क्या जानें कि उनकी खुजली से उत्पन्न इस आडिये से बाद की होने वाली पीड़ा को आमजन को ही सहना करना है । तुम्हारा क्या है, तुम्हारे लिए अतिथि ‘देवो भवः‘ तब ‘अतिथि कोटा भवः‘ हो जायेगा । सरकार के सीने पर ग़रीबों के हमदर्द होने का एक तमगा और लग जायेगा ।
-: सुनील सक्सेना
पत्रिका में दिनांक २८.०३.२०११ को प्रकाशित व्यंग्य