सोमवार, 22 जून 2020

हास्‍य व्‍यंग्‍य - लो आया “प्‍लेटॉनिक लव” का मौसम





हास्‍य व्‍यंग्‍य
लो आया “प्‍लेटॉनिक लव” का मौसम       
-: सुनील सक्‍सेना
                            एक है मोहन और एक है सोहन । दोनों दोस्‍त हैं । अब दोस्‍त क्‍या हैं,  एक ही पीजी में, एक ही कमरे में  रहते हैं  । एक ही बाथरूम यूज करते हैं  । सेम बाल्‍टी और मग शेयर करते हैं , तो मित्रता तो होना ही है । बावजूद इसके कि दोनों का नेचर एकदम उलट है । यानी मजबूरी का मित्र गठबंधन है ।
मोहन, यथा नाम तथा गुण । हरकतें बिल्‍कुल बंसीधर मुरलीवाले जैसी । चंचल, चपल, नटखट,  रास रसैया । आज  के हिसाब से बोले तो “माचो मेन”, “चिल”, “कूल डूड” । मिनिमम दो तीन कन्‍याओं से “हेंग आउट” रहता है । बचे-खुचे समय में आईआईटी क्रेक करने की तैयारी कर रहा है  ।  
बरक्‍स सोहन एकदम धीर-गंभीर । फोकस । पढ़ाकू । एक मात्र अंतिम लक्ष्‍य है उसका,  प्रशासनिक सेवा में चयन  । लाल बत्‍तीवाली गाड़ी । अब जवानी है तो कहानी भी जरूरी है । वरना वो  जवानी ही क्‍या  जिसकी कोई कहानी न हो । सो अपनी जवानी का पूरा सम्‍मान करते हुए,  शगुन के तौर पर सोहन की भी एक अदद प्रेमिका  है ।
मोहन और सोहन की मित्रता को टिकाऊ बनाये रखने का आधार है, मोहन की “गर्लफ्रेंड” और सोहन की “प्रेमिका” जो,  उनके पीजी के पास एक ही गर्ल्‍स हॉस्‍टल में रहती हैं  । मोहन के पास बाइक है । सोहन पेट्रोल के पैसे देता है ।  इस तरह  दोनों अपनी-अपनी बंदियों से मिलने मोटर साइकल से गर्ल्‍स हॉस्‍टल आते- जाते रहते हैं  ।  
 मोहन का “अफेयर” और सोहन की “मोहब्‍बत” ग्रीन जोन में लागू लॉकडाउन में ठीक ठाक चल रही है ।  आज जब वे दोनों अपनी प्रेयसियों से मिलकर पीजी पहुंचे ही थे,  कि मोहन को फोन पर  खबर मिली कि  “गर्ल्‍स हॉस्‍टल” को कोरोना संक्रमण के कारण सील कर दिया है । हॉस्‍टल में एक-दो नहीं चार लड़कियां कोरोना पॉजिटव पाई गईं  ।
खबर सुनते ही मोहन तुरंत वाशबेसिन की ओर लपका । कुल्‍ला करने लगा । कभी होंठों को साफ करता,  कभी जबान को “टंग क्‍लीनर” से साफ करने लगता । मुंह रगड़- रगड़ के धोने लगता  । कभी हाथ बार-बार धोने लगता ।  फाइनली संक्रमण के संभावित खतरे को समूल नष्‍ट करने के लिए वो नाहने चला गया । आधे घंटे बाद बाथरूम से निकला ।
सोहन ने पूछा “क्‍या हुआ यार तुझे, देख रहा हूं जब से मुंह धोये जा रहा है । कुल्‍ले कर रहा है । गरारे कर रहा है । आखिर हुआ क्‍या ? अब तू नहा कर भी आगया  ।  कुछ बतायेगा भी । माजरा क्‍या है ?
मोहन ने घबराते हुए कहा – “भाई मेरी वाली है न “कोरोना पॉजिटिव” निकली है ।
             “पर कैसे..?” सोहन ने चिंतित स्‍वर में पूछा
              “वही होमडिलेवरी वाला लफड़ा । मेडम ने पिज्‍जा बुलवाया था । आगई चपेट में । पर साले…तू बता । तू भी तो अभी मेरे साथ ही अपनी वाली से मिलकर आ रहा है । तू तो  ऐसे चुपचाप बैठा है, जैसे तुझे “इच्‍छा मृत्‍यु” का वरदान प्राप्‍त हो । बेटा ये कोरोना है  । ज्‍यादा होशियार मत बन । एक बार कोरोना चेंट गया न, तो किसी को नहीं छोड़ता ।” मोहन ने सोहन को हादसे की गंभीरता बताते हुए कहा ।
“तुझे पता है न मैं “कोविड 19”  की गाइड लाइन को स्ट्रिक्‍टली फॉलो कर रहा हूं । मास्‍क लगाता हूं । सेनेटाइजर यूज कर रहा हूं । दो गज की दूरी मेंटन कर रहा हूं । और बात रही तेरे जैसे मुंह धोने की  नाहने की,  तो सुन मेरे “प्‍ले बॉय”  डरने की जरूरत तुझे है,  मुझे नहीं ।  हमारा प्‍यार “प्‍लेटॉनिक लव” है । रूहानी इश्‍क । जिसमें जिस्‍म की कोई जगह नहीं । जहां यौनाकषर्ण का कोई वजूद नहीं ।  न स्‍पर्श । न आलिंगन । वासना से उपासना की ओर लेजाने वाला उदात्‍त प्रेम है हमारा । जहां संयम प्रेम की कसौटी है ।” 
“तो तेरा मतलब है अपने को भी ट्रेक बदलकर तेरे रास्‍ते पे चलना पड़ेगा । ये कोरोना  अब हम युवान को “मर्यादा पुरूषोत्‍तम” बना कर ही छोड़ेगा ।” मोहन ने खीझते हुए कहा ।  सोहन बगल वाले कमरे में शिफ्ट हो गया । मोहन चौदह दिन के लिए क्‍वारेंटाइन में है ।
---000---

शुक्रवार, 19 जून 2020

व्‍यंग्‍य - शापग्रस्‍त साइकलें





व्‍यंग्‍य
शापग्रस्‍त साइकलें
-: सुनील सक्‍सेना
                              फेक्‍ट्री बंद थी । महामारी ने कारखाने के दरवाजे हमेशा के लिए बंद कर दिये थे और बदनसीबी का ताला जड़ दिया था । अच्‍छे दिन वाली  चाबी न जाने कहां खो गई थी ।   गोडाउन में घुप्‍प अंधेरे में कई दिनों से निर्विकार पड़ी साइकलें बैचेन थीं  । छटपटा रही थीं । महीनों से  निष्क्रिय पड़-पड़े उनके अंग-अंग में जंग लग गया था । अभागिन साइकलें असहनीय पीड़ा से गुजर रही थीं । अतीत उनकी फौलादी मजबूती का साक्षी था, परंतु आधुनिकता ने साइकलों के अभेद्य किले को नेस्‍तनाबूद कर दिया था । साइकलें अपने अस्तित्‍व के लिए संघर्ष कर रही थीं,  इस उम्‍मीद में कि कभी तो उन्‍हें इस तिरस्‍कृत जिंदगी से निजात मिलेगी ।
तभी  मर्मांतक पीड़ा से भरी आवाज   सुनाई दी  – “कोई है यहां जो मुझे सुन सकता है ।  मैं सांस नहीं ले पा रही हूं…. मेरा दम घुट रहा है । मुझे बाहर निकलो प्‍लीज ।” ये लेडीज साइकल का स्‍वर था । जो  कभी पिंक कलर की हुआ करती थी, परंतु  बुरे दिनों की कालिमा ने उसे बदरंग कर दिया था । एक वक्‍त था, जब मार्केट में इसकी बड़ी डिमान्‍ड थी । बदलते जमाने की बदलती तस्‍वीर ने उसका नूर छीन लिया ।
वहीं पास में पड़ी आधी- अधूरी बनी, जेंटस साइकल ने कहा – घबराओ नहीं । ये वक्‍त है । वक्‍त कभी ठहरता नहीं है । मेरा मन कहता है,  ये वक्‍त भी गुजर जायेगा ।
पिंक साइकल भावुक हो गई, बोली – “मन की बात” मत करो । हकीकत से कब तक मुंह छुपाओगे ।  हम इतिहास में दर्ज होने जा रहे हैं । हम मनुष्‍य के जीवन संघर्ष गाथा का हिस्‍सा थे कभी  । कितने गर्व से कहता था वो, हम साइकल से मीलों दूर पढ़ने जाते थे, मोहल्‍ले में उसका रूतबा था, क्‍योंकि पूरे मोहल्‍ले में अकेले उसके पास  साइकल थी । जो सक्षम नहीं थे,  वे हमें कुछ घंटों के लिए किराये पर लेकर खुश हो जाते थे । कितनी ही प्रेम कहानियों का बिसमिल्‍लाह स्‍कूल-कॉलेजों में हम साइकलों ने  किया । साइकल की चेन उतर जाने के बहाने, प्रेमी युगलों में संवाद हमने ही शुरू करवाया । ऐसी मुख्‍तसर मुलकातों से न जाने कितनी मोहब्‍बतों  की दास्‍तानें  मुकम्‍मल हुईं । ये सारी बातें अब  किस्‍से- कहानियों में याद की जायेंगी । झूठी दिलासा  मत दिलाओ ।” 

आधी-अधूरी साइकल ने ढांढस बंधाते हुए कहा – “पगली ये बाजार है । सब्र कर हम फिर लौटेंगे । ”
“ये भ्रम है तुम्‍हारा । जब यौवन का ताब ठंडा पड़ जाता है, तो बाजार में उसका कोई खरीददार नहीं मिलता है । हम कब तक अपने पुराने चेहरे के साथ इस क्रूर  बाजार में घूमते रहते । ये तो एक दिन होना ही था । वो साइकलें खुश किस्‍मत थीं, जिन्‍हें मालिक ने अपने पापों के प्रयाश्चित के एवज में दान कर दिया । उनके नसीब में खुली हवा खुली सड़क सब कुछ था, जिसके लिए वो बनीं थीं । पर हमारी अकाल मौत निश्चित है ।
आधी-अधूरी साइकल,  मृत्‍यु को नजदीक जानकार दार्शनिक होगई उसने कहा – “हिम्‍मत रख…  जिसने हमें बनाया है, वो ही हमें पार लगायेगा ।”
“वो जिसने हमें बनाया था, कब का ये शहर छोड़कर अपने गांव चला गया । मूर्ख हो तुम जो आस लगाये बैठे हो कि वो लौटेगा । कितना असहाय और बेबस था वो ।  गिड़गिड़ा रहा था दाल रोटी और कुछ पैसों के लिए, पर मालिक ने उसकी एक न सुनी ।  भूखा प्‍यासा, खाली जेब निकल पड़ा वो न खत्‍म होने वाली यात्रा पर और पीछे छोड़ गया है, हम अभिशप्‍त साइकलों को….”  पिंक साइकल की सिसकियां गोदाम में गूंज रही थीं । एक सैलाब आया निरीह और असहाय  दिलों  से निकली हाय का,  और फेक्‍ट्री की दीवारें दरक गईं थीं ।
                                              ---000---


मंगलवार, 9 जून 2020

हास्‍य व्‍यंग्‍य - बंटी बबली का प्रेम और कोरोना




हास्‍य व्‍यंग्‍य
बंटी बबली का प्रेम और कोरोना
                                                                                   -: सुनील सक्‍सेना
                            
                बंटी नगर निगम में  मुलाजिम है ।  वो कचरा उठानेवाली गाड़ी पर अटैच है  । कचरा गाड़ी में इन दिनों एक गाना बजता है  “गाड़ीवाला आया घर से कचरा निकाल….” । जैसे ही इस गाने की आवाज सुनाई पड़ती है,  रॉयल कॉलोनी के रहवासी कचरे की थैलियां हाथों में लिए,  मुंह पर कपड़ा बांधे बाहर आजाते हैं ।

रॉयल कॉलोनी से लगी हुई झुग्‍गी बस्‍ती है सूरज  नगर ।  बंटी की गाड़ी वहां भी कचरा उठाने जाती है । गंदगी  करने का राइट  सिर्फ अमीरों के पास नहीं है । गरीब के घर से भी कचरा निकलता है । फर्क बस अमीर और गरीब के घर से  निकलने वाले कचरे में है ।  रॉयल कॉलोनी के कचरे में होती है चूसी हुई बोटियां, फलों के छिलके, स्‍कॉच और वाइन की खाली बोतलें । सूरज नगर के कचरे में  होती हैं सड़ी बुसी रोटियां, चावल जो रॉयल कॉलोनी में काम करनेवाली बाइयों को मेमसाब बड़े ठसके से देती हैं ।

कोरोना के चलते इन दिनों रॉयल कॉलोनी वाले  ज्‍यादा डरे हुए हैं । पहली बार हुआ है, ये “एलीट क्‍लास”   इतना मौत से भयभीत है । वरना सूरज नगर में ही मलेरिया, डेंगू , स्‍वाइन फ्लू जैसी बीमारियां अपना अड्डा  बरसों से जमाऐ हुए थे ।  कचरा गाड़ी के आते ही  कॉलोनी वाले कचरे की थैली बराबर दो गज की दूरी पर रख देते हैं । दूरियां तो पहले भी थीं । कोरोना ने और बढ़ा दी । पर सूरज  नगर में ऐसा नहीं है । डिसटेंस वही पुरानावाला  मेंटेन है  । बस सूरज नगर वाले अब आपस में गले नहीं मिलते हैं ।   

बंटी की एक बबली है सूरज नगर में ।  प्‍यार की कोपलों को  फूटे हुए ज्‍यादा दिन नहीं हुए हैं ।  प्रेम  बस  परवान चढ़ ही रहा है । गाड़ी की आवाज सुनते ही बबली रोज दरवाजे पर खड़ी हो जाती है । गरीब के साथ बड़ी मुसीबत है,  उसके घर से हर दिन कचरा नहीं निकलता ।  आज जब बबली बाहर आई तो उसके के हाथ में कचरे की थैली थी ।

“तेरा बाप आ गया लगता है ।” बंटी ने कचरे की थैली लेते हुए पूछा ।
“नहीं… । वो तो एक हफ्ता पहले झांसी से पैदल निकला है । जब निकला था तभी फोन किया था । तब से कोई खबर नहीं ।” बबली ने दुपट्टे से मुंह ढंकते हुए कहा ।
“तो तेरी मां आगई क्‍या ?”
“हां.. । कल कर्फ्यू  में एक घंटे की ढील थी । साब अपनी गाड़ी से छोड़कर गये उसको । गये सात दिन से साब  के घर पर थी । तू बता कैसा है ?
“मैं ठीक हूं ।” बंटी ने जोर से छींकते हुए कहा  ।
“तू छींका ?”
“मैं… कहां.. नहीं.. नहीं मैं तो बस ऐसे ही खांसा”
“तू छींका अभी.. खांसा भी । झूठ मत बोल ।”
“मैं सच्‍ची बोल रहा हूं बबली । न मैं छींका न खांसा । तेरी कसम ।”
“चल दूर हट । तुझको कोरोना लग गया । चल जा अभी ।”
“ये तो कचरे की एलर्जी है रे । मां कसम । तुझको भरोसा नहीं तो ले छू के देखले । कोरोना में बुखार भी आता है । मैं तो एकदम कूल हूं ।” बंटी ने अपना हाथ बबली के हाथ को लगभग टच कर दिया  ।
“मैंने कहा न दूर रह अभी । घर जा । अब  फटकना नहीं इधर ।  ” बबली  छिटककर ूघर के अंदर चली गई  ।
कचरा गाड़ी का ड्राइवर हॉर्न पर हॉर्न बजाए जारहा था । “चल बंटी चल । हो गया तेरी प्रेम कहानी का दी एंड ।”
बंटी कचरा गाड़ी में पीछे लटक गया ।  वो निराशा में बुदबुदाया  -  रे !  कोरोना  लोगों की जीवन लीला के अंत के पीछे तो तू पड़ा ही है,  हम मासूमों की प्रेम लीला पर तो रहम कर  ।

---000---


गुरुवार, 4 जून 2020

हास्‍य व्‍यंग्‍य - आत्‍मनिर्भर बनिए काम पर चलिए




हास्‍य व्‍यंग्‍य
आत्‍मनिर्भर बनिए काम पर चलिए
  
-: सुनील सक्‍सेना
                            भूखे-प्‍यासे । गिरते-पड़ते । पिटते-पिटाते । लुटते-लुटाते । अंतत: वो अपने गांव की सरहद पर पहुंच ही गया । उसने देखा वहां दो तम्‍बू गढ़े हुए हैं । एक में कोरोना की जांच हो रही है । दूसरे  में “आत्‍मनिर्भर” बनने के लिए पंजीयन चल रहा है । अब उसे चयन करना था कि गांव में प्रवेश करने से पहले वो कोरोना की जांच करवाये या आत्‍मनिर्भर बनने वाले लोगों की लाइन में लग जाये  । फाइनली उसने डिसाइड किया कि जब कोरोना के साथ ही जीना है,  तो क्‍यों न आत्‍मनिर्भर बनकर ही जंग में उतरा जाये । चुनांचे वो आत्‍मनिर्भर बनाने  वाली  लाइन में लग गया ।
उसका नंबर आया । शिविर में पंजीयन करने वाले कर्मचारी ने उससे पूछा -   “आधार कार्ड है ?”
वो बोला -  “हां हुजूर,  वो तो हमारे सीने से कर्ण के “दिव्‍य कवच” की भांति सदैव चिपका रहता है । बगैर आधार के हम जैसों का कोई आधार ही नहीं है हुजूर  । ये लीजिए ।”
सरकारी कारिंदे  ने आधार कार्ड में लगे फोटो को गौर से देखा और चेहरे का मिलान करने लगा ।  उसने पूछा -  “ये तुम्‍हारा ही फोटो है ? शक्‍ल तो मिलती नहीं तुम्‍हारी । जवानी फोटो की लगती है ।”

वो बोला – “ज्‍यादा पुराना नहीं है मालिक । ये फोटू हम तब खिंचवाये थे, जब हमारे बाप ने लतिया के हमें घर से बाहर निकाल दिया था, और हम अपने पांव पर खड़े होने के खातिर गांव छोड़कर शहर चले गये थे । अब क्‍या बतायें मालिक,  ये शहर बड़े बेदर्द और बेहरम होते हैं । हमने अपना खून पसीना बहाकर शहर का नक्‍शा बदल दिया । बदनसीबी देखिए हमारी साहब, हमने शहर की सूरत बदली और शहर ने हमारी सूरत बदल दी । भरी जवानी में बुढ़ा गये हम ।  इस फोटू में हम ही हैं, विश्‍वास करिए ।”

उसका नाम पंजीयन सू‍ची में दर्ज हो गया । बड़े बाबू से हिचकिचाते हुए बोला – “बुरा ने माने हूजूर तो एक बात पूछें ?
“पूछो”
“हम कितने दिन में आत्‍मनिर्भर हो जायेंगे मालिक ?”
                “कुछ कह नहीं सकते…” बड़ा बाबू बोला
“फिर भी कोई तो टाइम लिमिट होगी हुजूर  । काहे से मालिक, हमारी तो पीढि़यां गुजर गई , कोई भी  आज तक आत्‍मनिर्भर नहीं हो पाया । कहते सब हैं, पर करता कोई नहीं ।”
बड़े बाबू आत्‍मनिर्भर बनने की “ गाइड लाइन” पढ़ने लगे, जो हाल ही में जारी हुई थी  । एक पेज पर रूक कर बोले – “कम से पांच साल तो लगेंगे… बाकी तुम्‍हारी मेहनत  पे डिपेंड करता है ।”
 “पांच साल ! पांच साल तो बहुत हो जायेंगे हुजूर । कोई तो स्‍कीम होगी जिससे हम एक-दो साल में आत्‍मनिर्भर हो जायें । आपके पास तो तमाम मॉडल हैं, प्‍लान हैं ।”
बड़े  बाबू भड़क गये । कहने लगे- “समय लगता है हर चीज में । अभी तो आत्‍मनिर्भर बनाने का आइडिया “भ्रूण अवस्‍था” में है । बच्‍चे को भी जन्‍म लेने में नौ महीने का समय लगता है । यहां तो एक सौ तीस करोड़ लोगों को आत्‍मनर्भिर बनाना है ।़”
“नाराज न हों  मालिक ।  बस एक कनफ्यूजन और दूर करदें बड़ी मेहरबानी होगी । इन पांच साल में हम कितने आत्‍मनर्भिर हो जायेंगे ?  मतलब फिफ्टी परसेंट, सेवेन्‍टी परसेंट या हंड्रेड परसेंट ?”
बड़े बाबू तल्‍ख लहजे में बोले – “हंड्रेड परसेंट कोई आत्‍मनिर्भर नहीं होता है । न ही हम किसी को  हंड्रेड परसेंट आत्‍मनिर्भर बनाते हैं । एक बार आदमी हंड्रेड परसेंट आत्‍मनिर्भर हो जाये,  तो गर्राने लगता है । खलीफा हो जाता है । हां,  हम तुमको इतना सक्षम बना देंगे कि तुम्‍हें किसी दूसरे की जरूरत नहीं पड़ेगी ।”
“और मालिक खुदा न खास्‍ता कभी “दूसरे” को हमारी जरूररत पड़ जाये तो । नहीं.. मतलब हम ऐसे ही पूछे मालिक गुस्‍ताखी माफ हो ।”
बड़े बाबू तमतमा गये । “तुम हमको बेवकूफ समझे हो । सब आत्‍मनिर्भर हो जायेंगे तो हमारा डिपार्टमेंट ही बंद हो जायेगा । हमारे भी बीवी बच्‍चे हैं । सुना नहीं तुमने मैंने क्‍या कहा अभी, “पूर्ण आत्‍मनिर्भर” हम किसी को नहीं बनाते हैं । इतनी गुंजाइश रखते हैं कि जब “दूसरे” को जरूरत पड़े तो  काम आ सको  ।” 
वो बड़े बाबू की “गुगली” में फंस गया था । उसने चुपचाप से पंजीयन की स्लिप ली और कोरोना की जांचवाली लाइन में लग गया ।
---000---