हास्य व्यंग्य
आदमी के अंदरवाला जानवर
-: सुनील सक्सेना
मैंने मेल खोली तो देखा बलवंत के बेटे की शादी का कार्ड है । दिमाग ठनका । देव तो सो गये हैं । देवों
ने तो “डू नॉट डिस्टर्ब” का बोर्ड टांग दिया है । अब तीन
महीने तक नो शादी । नो बेंड बाजा बारात । खैर चलो , फाइनली बलवंत को बहू मिल ही गई । पर शादी का कार्ड वो भी मेल से । भई दो गज की
दूरी ही तो मेंटेन करना है । हम कौन से परदेस में रहते हैं, एक ही शहर तो है । घर आकर भी कार्ड दे सकता था । मैं उलझन में था
कि ऐसी क्या विपदा आन पड़ी की बलवंत आनन फानन में बेटे की शादी कर रहा है ।
श्रीमतीजी ने काढ़े का गिलास मुझे थमाया
और लगीं पिनपिनाने - सुबह हुई नहीं कि मोबाइल
पर सीधे हाथ जाता है आपका ।
“अरे ! देखो तो सही । बलवंत के बेटे का
शादी का कार्ड आया है ।” मैंने कहा
“फंस गई होगी कोई मालदार पार्टी । दहेज
के चक्कर में लड़का बुढ़ा गया । पर एक बात तो मेरी भी समझ नहीं आ रही है कि हम बलवंत
के कबसे इतने करीब हो गये कि हमें निमंत्रण भेजा है ।
श्रीमतीजी का सोचना सही था । सरकार
ने बराती-घराती मिलाकर पचास का कोटा फिक्स कर दिया है । यानी हम पचास में शामिल थे । मन खुशी से उछालें
मारने लगा मानो “फोर्ब्स पत्रिका” के द्वारा जारी टॉप फिफटी “घनिष्ट मित्रों” की सूची में हमारा नाम आ गया हो ।
वेडिंग कार्ड डाउनलोड किया तो दर्शानाभिलाषी
में बेटी दामाद के नाम के साथ एक नाम “रॉकी” लिखा था । जहां तक मुझे मालूम है बलवंत
के एक बेटा और एक बेटी है । बेटी की शादी होगई है और उसके बेटे का नाम “मेले मामा की शादी में जलूल-जलूल आना” में दिख रहा था । पर दर्शानाभिलाषी
में ये “रॉकी” नाम मेरे लिये अपरिचित था ।
“यार ये रॉकी कौन है ?” मैंने काढ़े का सिप लेते हुए श्रीमतीजी से पूछा ।
श्रीमतीजी ने कंधे उचकाये और
बुरासा मुंह बनाते हुऐ बोलीं - “पता नहीं..”
चंदा । चंदा हमारी कामवाली बाई है
। मल्टी फंक्शनल है । सबकी खबर ले और सबकी खबर दे । सदैव चौकन्नी । मुस्तैद । मुसाद
के सीक्रेट एजेंट की तरह आंख कान सब खुले रखती है । मेरे प्रश्न का उत्तर दन्न
से चंदा ने दिया - “रॉकी, बलवंत साहब के कुत्ते का नाम है ।”
मैं चौंका कुत्ते का नाम स्वागतातुर
में । हद हो गई । ठीक है बलवंत को प्यारा होगा रॉकी से, पर अतिथियों का स्वागत, वो भी कुत्ते से ।
चंदा ने बलवंत और रॉकी के याराने
का रहस्य खोलते हुए बताया - “बलवंत साब भौत मानते हैं रॉकी को ।
पूजा पाठ हो, बर्थडे हो, होटल में पार्टी हो रॉकी के बिना कोई
प्रोग्राम नहीं होता । घर का मेम्बर है रॉकी ।”
“हाउस मेडस” के पास हर घर की जन्मकुडली होती
है । चिडि़या घर में कौन शेर है कौन बिल्ली है कौन उल्लू है, इन “हाउस मेडस” को पूरी जानकारी होती है ।
मैं बलवंत के रॉकी के प्रति अगाध
प्रेम पर कुर्बान हो गया । जानवर का ऐसा मानवीकरण मैंने पहले कभी न देखा न सुना
। मुझे अचानक युधिष्ठर और उनका श्वान याद
आ गये, जिसे वे अपने साथ स्वर्गलोक तक ले गये थे, पर इंद्र ने एंट्री नहीं दी ।
शादी के कुछ दिनों बाद बलवंत की एक
और मेल आई । खोला तो “शोक संदेश” था । नई नवेली बहू के “उठावने” का संदेश । इस बार शोक संदेश में
रॉकी का नाम नदारद था ।
मुझे सीक्रेट एजेंट चंदा का इंतजार
था । मेरे मुंह से बलवंत शब्द निकला ही था,
चंदा बताने लगी- “बहू कैसे मरी मालूम नहीं साब । जितने मुंह उतनी बातें.. घर में बहू से रोज झगड़ा होता था… कोई ऊंचे मॉडल की कार चाहिए थी,
बलवंत साब के बेटे को । अब आदमी को जानवर बनने में टैम कहां लगता है साब । एक रात ऐसी सोई कि फिर उठ
नहीं । उसी दिन रॉकी घर छोड़कर चला गया ।
मेरे कानों में उस मनहूस रात कुत्ते
के रोने की आवाज गूंजने लगी । शायद रॉकी ही था । कहते हैं कुत्ते मौत की आहट सुन लेते हैं । उन्हें यमराज दिखने
लगते हैं । मौत की आहट सुन लेते हैं वो । पर बोल नहीं सकते । काश कोई सुन लेता
रॉकी की आवाज । है न अजब तमाशा । बंदर से इंसान बने हम । जानवर ने सीख ली इंसानियत
हमसे । हमारे अंदर का जानवर अभी तलक जिंदा
है, मरता ही नहीं ।
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