हास्य व्यंग्य
मन लागा यार फकीरी में
-: सुनील सक्सेना
श्रीमती
गुप्ता भयभीत हैं । कोरोना से नहीं लॉकडाउन से । अभी तक जैसे-तैसे उन्होंने पतिदेव को संभाल कर रखा है । बड़ी अजीब- अजीब, बहकी- बहकी सी, अर्रबर्र बातें करने लगे हैं श्रीमान आजकल । डेली शेव
करते थे । अब दाढ़ी बढ़ गई है, कहते हैं शेव नहीं करूंगा । बाबा बनुंगा । पतिदेव को
समझाया कि भक्ति चैनलों को जरा गौर से
देखिये एक भी दाढ़ीवाला दिखता है कहीं ।
चिकने चुपड़े, हेंडसम, टिपटॉप पूरे मेकआप के साथ ज्ञान गंगा बहाते हैं । पर वे
जिद पर अड़े हैं । केश नहीं कटवाऊंगा । श्रीमती
गुप्ता चिंतित हैं कहीं लॉकडाउन और बढ़
गया तो गुप्ता जी निश्चित ही हिमालय की ओर कूच कर लेंगे ।
टीवी पर रामायण चल रही थी । बिजली
गुल हो गई । गुप्ता जी शुरू हो गये, बोले- जीवन व्यर्थ है । माया है
। मिथ्या है । बेवजह दौड़े जा रहे हैं । भागे जा रहे हैं । खुद से । अपनों से
। पगला गया है मनुष्य । घर, बंगला, हवेली, महल सब मिट्टी है । मनुष्य को क्या
चाहिए ? सर ढंकने के लिए एक छप्पर । खाने को
रोटी । दाल भी जरूरी नहीं । लॉकडाउन में अभी नमक रोटी खा ही रहें हैं न । आदत पड़
गई न । जिंदा है । मरे तो नहीं । न अचार । न पापड़ । न सॉस । अब किसी भी “एडऑन” की खाने में जरूरत महसूस नहीं
होती । कपड़ा “ऑप्शनल” है । तन ही तो ढंकना है । लॉकडाउन में कौन पेंट शर्ट पहन रहा है, “अंडरवेयर्स” से ही काम चल रहा है । रहा पीने का सवाल तो देश की अर्थव्यवस्था को
मजबूत करने के लिए बांकुरे लाइनों में घंटों से लगे हैं । पुलिस के डंडे खा रहे
हैं । बेचारों को उतनी भी मयस्सर नहीं
जितनी छोड़ दिया करते थे पैमाने में ।
लीवर कुलांचे मार रहा है उनका ।
लाओ रे कच्ची-पक्की कुछ तो डालो पेट में । जीवित हैं, बिना मद्यपान के ।
गुप्ता जी के मुंह से सरस्वति
फूट रही है, कहने लगे- “घर, परिवार, नाते-रिश्ते, अड़ोसी-पड़ोसी, मित्र, बांधव सब बंधन हैं । फालतू हैं
। मोह है । जकड़ रखा है मनुष्य को । कोई
काम नहीं आता है । आज कौन काम आरहा है । टीवी और मोबाइल ही न । कितना बुरा भला कहा
दुनिया ने इन्हें । टीवी “इडियट बॉक्स” है । मोबाइल गले में लटका झुनझुना
है, पत्नियों के लिए सौतन है, बच्चों के लिए “एडिक्शन” है । आज लॉकडाउन की इस दुख:द घड़ी में सच्चे साथी बनकर उभरे हैं, टीवी और मोबाइल । इन्हीं की बदौलत हम घर में है और कोरोना बाहर । कोई सगा
नहीं । मन से तो दूर थे ही पहले, अब तो तन से भी छ: फुट की दूरी
अनिवार्य हो गई है । “सोशल डिस्टेंसिंग” ने अंत समय में चार कंधे भी छीन लिये हैं । काहे कि मुखग्नि और काहे का पिंडदान,
घरवाले मरे का चेहरा नहीं देख पा रहे हैं । सरकारी बंदे बॉडी को फूंक रहे हैं । अस्थियां थैली में पड़ीं विसर्जन के लिए
फड़फड़ा रही हैं ।”
गुप्ता जी पूरे मूड में थे, बोले - “ये ऊपरवाले का क्रोध है । अजाब है । वो
नटखट नटवर दिखाई नहीं देता । कोरोना भी अगोचर है । वो निराकार है । कोरोना भी । जब-जब
पृथ्वी पर अत्याचार, पाप, भ्रष्टाचार व्यभिचार बढ़ेगा “कोविड 19” जैसी अज्ञात शक्तियां मानवजाति का विनाश करने के
लिए अवतरित होंगी । यही समय है अपने पापों का प्रायश्चित करने का । फेक्ट्रियां
बंद है । गंदगी बंद है । गंगा निर्मल हो गई । संगम में गुप्त सरस्वति दिखने लगी
है । प्रदूषण शून्य में प्रवेश कर रहा है । घरों से हिमालय की हिमाच्छादित चोटियां दष्टिगोचर हो रही हैं ।
गगन नीला
स्वच्छ दिखाई दे रहा है । अब आत्मा
सीधे परमात्मा से बगैर किसी अवरोध के ऊपर
सीधे मिल जायेगी । रे मूर्ख ! किसका इंतजार कर रहा है ? लाइट का इंतजार हो रहा था । आगई ।
रामयण खत्म हो गई । टीवी पर प्यासा फिल्म
का गाना चल रहा है “ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या
है….”
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