बुधवार, 13 मई 2020

हास्‍य व्‍यंग्‍य - मन लागा यार फकीरी में




हास्‍य व्‍यंग्‍य
मन लागा यार फकीरी में      
-: सुनील सक्‍सेना
                            श्रीमती गुप्‍ता भयभीत हैं । कोरोना से नहीं लॉकडाउन से । अभी तक जैसे-तैसे उन्‍होंने  पतिदेव को संभाल कर रखा है । बड़ी अजीब- अजीब,  बहकी- बहकी सी,  अर्रबर्र  बातें करने लगे हैं श्रीमान आजकल । डेली शेव करते थे । अब दाढ़ी बढ़ गई है, कहते हैं शेव नहीं करूंगा । बाबा बनुंगा । पतिदेव को समझाया कि भक्‍ति चैनलों को जरा  गौर से देखिये एक भी दाढ़ीवाला दिखता है कहीं  । चिकने चुपड़े,  हेंडसम,  टिपटॉप पूरे मेकआप के साथ ज्ञान गंगा बहाते हैं । पर वे जिद पर अड़े हैं । केश नहीं कटवाऊंगा ।  श्रीमती गुप्‍ता चिंतित हैं  कहीं लॉकडाउन और बढ़ गया तो  गुप्‍ता जी  निश्चित ही हिमालय की ओर कूच कर लेंगे  
टीवी पर रामायण चल रही थी । बिजली गुल हो गई । गुप्‍ता जी  शुरू हो गये, बोले- जीवन व्‍यर्थ है । माया है । मिथ्‍या है । बेवजह दौड़े जा रहे हैं । भागे जा रहे हैं । खुद से । अपनों से ।  पगला गया है मनुष्‍य ।   घर, बंगला, हवेली, महल सब मिट्टी है । मनुष्‍य को क्‍या चाहिए ? सर ढंकने के लिए एक छप्‍पर  । खाने को रोटी । दाल भी जरूरी नहीं । लॉकडाउन में अभी नमक रोटी खा ही रहें हैं न । आदत पड़ गई न । जिंदा है । मरे तो नहीं । न अचार । न पापड़ । न सॉस । अब किसी भी एडऑन की खाने में जरूरत महसूस नहीं होती । कपड़ा ऑप्‍शनल है । तन ही तो ढंकना है । लॉकडाउन में कौन पेंट शर्ट पहन रहा है, “अंडरवेयर्स से ही काम चल रहा है ।  रहा पीने का सवाल तो देश की अर्थव्‍यवस्‍था को मजबूत करने के लिए बांकुरे लाइनों में घंटों से लगे हैं । पुलिस के डंडे खा रहे हैं ।  बेचारों को उतनी भी मयस्‍सर नहीं जितनी छोड़ दिया करते थे पैमाने में ।  लीवर कुलांचे मार रहा है उनका  । लाओ रे कच्‍ची-पक्‍की कुछ तो डालो पेट में । जीवित हैं, बिना मद्यपान के  
              गुप्‍ता जी के मुंह से सरस्‍वति फूट रही है,  कहने लगे-  घर, परिवार, नाते-रिश्‍ते, अड़ोसी-पड़ोसी, मित्र, बांधव सब बंधन हैं । फालतू हैं ।  मोह है । जकड़ रखा है मनुष्‍य को । कोई काम नहीं आता है । आज कौन काम आरहा है । टीवी और मोबाइल ही न । कितना बुरा भला कहा दुनिया ने  इन्‍हें । टीवी इडियट बॉक्‍स है । मोबाइल गले में लटका झुनझुना है,  पत्नियों के लिए सौतन है,  बच्‍चों के लिए एडिक्‍शन है । आज लॉकडाउन की इस दुख: घड़ी में सच्‍चे साथी बनकर उभरे हैं, टीवी और मोबाइल । इन्‍हीं  की बदौलत हम घर में है और कोरोना बाहर । कोई सगा नहीं । मन से तो दूर थे ही पहले,  अब तो तन से भी छ:  फुट  की दूरी अनिवार्य हो गई है ।  सोशल डिस्‍टेंसिंग ने अंत समय में चार कंधे भी छीन लिये हैं ।  काहे कि मुखग्नि और काहे का पिंडदान,  घरवाले मरे का चेहरा नहीं देख पा रहे हैं ।  सरकारी बंदे बॉडी को फूंक रहे हैं  । अस्थियां थैली में पड़ीं विसर्जन के लिए फड़फड़ा रही हैं । 
गुप्‍ता जी पूरे मूड में थे,  बोले -   ये ऊपरवाले का क्रोध है । अजाब है   वो नटखट नटवर दिखाई नहीं देता । कोरोना भी अगोचर है । वो निराकार है । कोरोना भी । जब-जब पृथ्‍वी पर अत्‍याचार, पाप, भ्रष्‍टाचार व्‍यभिचार बढ़ेगा कोविड 19 जैसी अज्ञात शक्तियां मानवजाति का विनाश करने के लिए अवतरित होंगी । यही समय है अपने पापों का प्रायश्चित करने का । फेक्ट्रियां बंद है । गंदगी बंद है । गंगा निर्मल हो गई । संगम में गुप्‍त सरस्‍वति दिखने लगी है । प्रदूषण शून्‍य में प्रवेश कर रहा है । घरों से हिमालय की  हिमाच्‍छादित चोटियां दष्टिगोचर हो रही हैं । गगन  नीला  स्‍वच्‍छ दिखाई  दे रहा है । अब आत्‍मा सीधे परमात्‍मा से बगैर किसी अवरोध के  ऊपर सीधे मिल जायेगी ।  रे मूर्ख ! किसका इंतजार कर रहा है ? लाइट का इंतजार हो रहा था । आगई । रामयण खत्‍म हो गई । टीवी पर  प्‍यासा फिल्‍म का गाना चल रहा है  ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्‍या है….”
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गुरुवार, 7 मई 2020

लघुकथा - एक अंतहीन यात्रा का अंत




एक अंतहीन यात्रा का अंत   
-: सुनील सक्‍सेना
                           वो और उसका कुत्‍ता शेरू दोनों को पैदल चलते-चलते आज पांच दिन हो गये थे । शहर में काम धंधा सब बंद हो गया । पैसे खत्‍म । सेठ से मांगे तो बोलता है गांव वापस चला जा ।  मुसीबत में दया, कृपा, रहम सब बेवफा हो जाते हैं  । पुलिस कहती है घर में बैठ नहीं तो कोरोना लग जायेगा । वो सोचता,  कोरोना तो तब लगेगा जब मैं बचुंगा । गरीब को तो बस भूख लगती है, जिसके लिए हजारों मील अपना गांव छोड़कर वो इस शहर में आया था ।  मुनादी हो रही थी-  जो जहां हैं, वहीं रहें । घर में रहें, सुरक्षित रहें । जान है तो जहान है ।  उसने पहली बार बड़ी शिद्दत से महसूस किया बस जान ही उसकी है, जहान तो सिर्फ कहने के लिए है ।
अब मरता क्‍या न करता । उस दिन भीड़ के साथ वो भी अपने गांव के लिए निकल पड़ा । भगदड़ और भागमभाग में जो कुछ घर में था, उसने थैले में डाल लिया था ।  कुछ चने,  बची हुई रोटियां और बिस्‍कुट  शेरू के लिए । वो शेरू को शहर में ही छोड़कर निकलने वाला था । जानता था कि खुद उसका ही कोई ठिकाना नहीं, शेरू को लिए कहां-कहां भटकेगा । शेरू उसके सुख-दुख में हमेशा साथ रहा है । जानवर है , लेकिन वफादार है ।  पीछे लग गया उसके । छोड़े ही न । वो माइलस्‍टोन जिस पर उसके गांव का नाम लिखा है, मालूम नहीं और कितनी दूर है ।  बस वो दोनों तो निकल पड़े ।
              दोनों भूखे थे । हाइवे पर खाने के पेकेट बंट रहे थे । चार पूड़ी और आलू की सब्‍जी । एक पेकेट उसने ले लिया ।  दूसारा शेरू के लिए,  उसने हाथ बढ़ाया तो आदमी बोला – “एक दिया न तुझे चल आगे बढ़.. कुत्‍ते बिल्लियों के लिए खाना नहीं है ।वो चुपचाप लाइन से हट गया । जो मिला वो काफी था । पता नहीं अब कब खाना नसीब होगा ।
              सड़के सूनसान थीं । पिछले सात दिनों से सड़क पर उसे न बस,  ट्रक, कोई गाड़ी नहीं दिखाई दी थी । अचानक एक साथ कई बसों के हॉर्न सुनाई दिये । उसने पलट कर देखा एक दो नहीं बसों की लम्‍बी लाइन थी,  जो उसके गांववाले रास्‍ते पर जा रही थीं । वो शेरू को लेकर सड़क के बीचोंबीच  खड़ा हो गया । बस रोको भैया.. रोको.. बसों में लड़के-लड़कियां थे । सोशल डिस्‍टेंसिंग को फॉलो कर रहे थे । एक सीट पर केवल एक ।  साधन सम्‍पन्‍न परिवारों के विस्‍थापित विद्यार्थी थे  । विस्‍थापित तो वो भी था ।
बस रूकी ।  कंडक्‍टर चिल्‍लाया- “मरना है क्‍या ?  बीच सड़क में खड़ा है…”
भैया हमें भी बिठालो बस में । बलरामपुर उतर जायेंगे ।
यहां पैर रखने तक की जगह नहीं तू कुत्‍ते के साथ बैठेगा चल हठ कंडक्‍टर ने भद्दी गाली भी दी ।
 एक-एक करके सारी बसें  रसूखदार  घरों के चिरागों को लेकर निकल गईं । वो और शेरू फिर चल दिये । अंतहीन यात्रा पर । थक गये थे दोनों  । एक-एक कदम भारी पड़ रहा था । शेरू सड़क पर पसर गया । उसकी आंखें बंद । जीभ बाहर । शेरू मर गया था,  और इंसानियत,  वो तो कब की मर चुकी थी ।   

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रविवार, 3 मई 2020

हास्‍य- व्‍यंग्‍य - विकास के साइड इफेक्‍ट




हास्‍य- व्‍यंग्‍य
विकास के साइड इफेक्‍ट
-: सुनील सक्‍सेना
हम विकासशील हैं । विकसित होने की ओर अग्रसर हैं । विकास किसको अच्‍छा नहीं लगता । पर विकास के साथ  लोचा है । जब विकास होता है तो कुछ खोना भी पड़ता है । अर्थव्‍यवस्‍था मजबूत हुई । रूपया मजबूत हुआ । चवन्‍नी गायब हो गई । इंसान टेस्‍ट टयूब से पैदा होने लगे,  इंसानियत चली गई । अब मानव के क्रमिक विकास की श्रृंखला में एक जीवशास्‍त्री घोर अनुसंधान के बाद इस नतीजे पर पहुंचा है कि भविष्‍य में मनुष्‍य के बत्‍तीस नहीं अठ्ठाइस दांत होंगे ।
वैसे सच पूछिये तो मैंने कभी गिनने का प्रयास नहीं किया कि कितने हैं ।  गुणीजनों ने कहा तो  मान लिया बिना किसी बहस मुबाहिसे के कि हां.. भई बत्‍तीस ही होते हैं । ठीक वैसे ही जैसे स्‍कूल में गुरूजी गणित के सवाल हल  कराते समय कहते थे – “मान लो मोहन का एक बगीचा है ।  उसमें आम के दस पेड़ हैं । हम बिना किसी हुज्‍जत के स्‍वीकार कर लेते थे ।
              शोधकर्ताओं ने इन अठ्ठाइसदांतों की वजह के लिए दलील दी है कि जिन अंग-प्रत्‍यंगों  का मानव उपयोग करना बंद कर देता है,  कालांतर में वे  समाप्‍त हो जाते हैं ।  बिल्‍कुल सरकारी बजट की तरह । यूज नहीं किया तो बजट लेप्‍स । क्रेडिट कार्ड के बोनस पाइंट की तरह,  अगर रिडीम नहीं किये तो पॉइंट खत्‍म ।  ठीक उस पूंछ की तरह जो परमात्‍मा ने हमें दी थी कि बंदा खुद भले ही कितना गंदा हो, कम से कम जिस जगह पर  बैठगा,  उसे अपनी  दुम से साफ करके बैठेगा । हमने  दुम का दुरूपयोग किया  । हमें दुम हिलाने की आदत पड़ गई । दुम हट गई ।  दंत विशेषज्ञ कहते हैं कि अब अक्‍कल दाढ़ भी नहीं निकलती । शायद हमने अक्‍कल का इस्‍तेमाल करना  भी बंद कर दिया है 
अब कौन जाने विधाता ने अठ्ठाइस  दांतों का डिसीजन भी इस बिना पर लिया हो कि भई अखरोट खाने की तेरी औकात नहीं, गन्‍ना तू दांतों से  छील न सके । लोहे के चने चबवा देनेवाली नस्‍लें पैदा होना  बंद हो गईं । तो बत्‍तीस दांत का करेगा क्‍या तू ? वैसे भी तुझे तो पिज्‍जा खाना है,  नूडलल्‍स खाना है, तो अठ्ठाइसदांत काफी हैं । बचे चार दांत किसी जरूरतमंद को दूंगा, कम से कम आभारी रहेगा ।   
कुछ देर के लिए मान लीजिए कि ये जैविक खोज सच निकल है तो सबसे अहम सवाल ये होगा कि वो चार दांत होंगे कौन से ? क्‍या इन चार में दाढ़ों को शामिल किया है अथवा इन्‍हें कोई छूट दी गई है । क्‍या वो इंटेक्‍ट रहेंगी ?  यदि नहीं,  तो चलो ठीक है एकाध दाढ़ कम भी हो तो  बंदा  कुछ चबा लेगा, कुछ लील लेगा । गुजारा कर लेगा । पर यदि इन कम होनेवाले चार दांतों  का अभिप्राय दांत मात्र से है,  तो कल्‍पना कीजिए  मोती जैसी दंत पंक्ति में जब ऊपर के दो और नीचे के दो दांत नहीं होंगे तो हमारा  मुखमंडल  कैसा  होगा । रूप, सौंदर्य, चांद सा चेहरा,  श्रंगार रस की तो धज्जियां उड़ जायेंगी । 
तनिक सोचिए दांतों से जुड़ी उपमाओं और विशेषणों क्‍या हश्र होगा ? क्‍या हम खिसयाते हुए अपनी बत्‍तीसी  दिखा पायेंगे ? क्‍या हम अपने  पौरूष प्रदर्शन  में किसी की एक ही झापड़ में बत्‍तीसी बाहर कर पाएंगे ? साहित्‍य में बत्‍तीस दांतों से जुड़ी वो तमाम कहावतें, मुहावरे, उक्तियां सब स्‍क्रेप हो जायेंगी  
पर चिंता की बात नहीं है । घबराये नहीं । वैज्ञानिक हैं । उनका काम है रिसर्च करना । रोजी-रोटी है उनकी ।  हर रिसर्च सच साबित हो ये जरूरी तो नहीं ।  मौसम वैज्ञानिक जब  घोषणा करते हैं कि दिन में गरज के साथ छींटे  पड़ेंगे, उस दिन  मस्‍त धूप खिलती है । भूल-चूक हो सकती है । इसलिए चिल रहिए ।  लॉकडाउन एंजॉय कीजिए ।
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