व्यंग्य
सड़क
पर पड़े नोट और भूख
-: सुनील
सक्सेना
वो
बहुत देर से देख रहा था । सड़क पर लगभग एक साइज के कागज के कुछ टुकड़े पड़े हैं । कुछ-कुछ नोट के आकार के । घर में राशन खत्म हो गया था । पैसे भी खत्म
। शायद तीव्र भूख की वजह से उसे भ्रम हो
रहा था कि सड़क पर नोट पड़े हैं । वरना कौन मूढ़मति होगा जो सड़क पर नोटों को यूं ही
छोड़ देगा । उसके देखते- देखत चार-पांच
सरकारी गाडि़या गुजर चुकी थीं । नोट होते, तो कोई भी खीसे
में रखकर चम्पत हो गया होता । सुनसान
सड़क पर निर्विकार नोट पड़े हुए थे । हवा
चलती तो थोड़ा दायें-बायें खिसक जाते थे ।
वो
बैचेन था । कनफर्म करने के लिए कि नोट हैं
या कागज के पुर्जे, वो बार-बार दरवाजे तक जाता
और टकटकी लगाये देखने लगता । अब वो इतने साफ दिखाई दे रहे थे कि उन्हें वो गिना सकता
था । पूरे दस थे । हवा का एक तेज झोंका आया । उन दस में से एक फड़फड़ाता हुआ उसके
दरवाजे के पास आ गया । देखा तो नक्की हो गया, वो नोट ही हैं । गांधीजी का चश्मा पहने हुए
फोटो एकदम क्लिअर दिखाई दे रहा था । बस एक बार थोड़ी तेज हवा चल जाऐ और नोट पलट
जाये, तो पक्का
उसके पीछे “लाल
किला” ही होगा । ऊपरवाले ने उसकी सुनी । हवा चली । नोट पलटा ।
लाल किला दिखा । कनफर्म हो गया “पांच सौ” का नोट है ।
उसके
मन में शंका ने जन्म लिया, कहीं
चूरन छाप नोट तो नहीं ? कोई दिल्लगी तो नहीं कर रहा । लॉकडाउन
में एवईं टाइम पास के लिए किसी ने खिड़की से फेंक दिये हों, और
चुपके से देख रहा हो कि कौन बेवकूफ
बनता है । भला ऐसे कोई सच्ची-मुच्ची का
नोट काहे को सड़क पर फेंकेगा ? उसे याद आया एक बार सिंह साहब
के घर के बाहर कचरे में नोट पड़े हुए मिले थे । हड़कम्प मच गया था । बाद में पता चला उनके यहां इनकम टेक्स की रेड
पड़ी थी ।
पर
इस समय जठर अग्नि को शांत करना उसकी प्राथमिकता थी । भूख से बेहाल था परिवार । सरकारी खाने के पेकेट दो दिन से बंद हैं । डिलिवरी
बॉय पॉजिटिव निकला । वो सोचने लगा नोट उठा
भी लूंगा तो किस काम का ? दूकानें बंद । रास्ते
बंद । पेट की भूख नोटों से शांत नहीं होनेवाली । उसने फील किया कि उसे माया से “वितृष्णा” होने लगी ।
“बापू भूख लगी है..” उसका बेटा दरवाजे के पास आकर
बोला । बेटे की नजर नोट पर पड़ी । वो लपका । चीखा । बापू देखो ये क्या है । नोट बेटे
के हाथ में था । सामने पुलिस चौकी पर पुलिसवाला जो अभी तक पीठ करके बैठा था, पलटा । सड़क पर बिखरे नोट देखते ही पुलिसवाला हरकत में आ गया । हाथों में
दस्ताने पहने वो एक-एक नोट को बड़े जतन
से उठाने लगा । मानो लेंडमाइन के बमों का डिफ्यूज कर रहा हो । उसने बेटे से संभावित कोरोना संक्रमित नोट लेकर
पन्नी में रख लिया । पुलिसवाला कड़क आवाज में स्लोगन बोला – “घर में रहो । सुरक्षित
रहो ।” घर में भूख और पैसे के बीच संघर्ष जारी था ।
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