गुरुवार, 30 अप्रैल 2020

व्‍यंग्‍य - सड़क पर पड़े नोट और भूख




व्‍यंग्‍य
सड़क पर पड़े नोट और भूख  
-: सुनील सक्‍सेना
वो बहुत देर से देख रहा था । सड़क पर लगभग एक साइज के कागज के कुछ टुकड़े पड़े हैं ।  कुछ-कुछ  नोट के आकार के  । घर में राशन खत्‍म हो गया था । पैसे भी खत्‍म । शायद  तीव्र भूख की वजह से उसे भ्रम हो रहा था कि सड़क पर नोट पड़े हैं । वरना कौन मूढ़मति होगा जो सड़क पर नोटों को यूं ही छोड़ देगा । उसके देखते- देखत चार-पांच सरकारी गाडि़या गुजर चुकी थीं । नोट होते, तो कोई भी खीसे में रखकर चम्‍पत  हो गया होता । सुनसान सड़क पर निर्विकार नोट पड़े हुए  थे । हवा चलती तो थोड़ा दायें-बायें खिसक जाते थे ।
वो बैचेन था । कनफर्म  करने के लिए कि नोट हैं या कागज के पुर्जे, वो बार-बार दरवाजे तक जाता और टकटकी लगाये देखने लगता । अब वो इतने साफ दिखाई दे रहे थे कि उन्‍हें वो गिना सकता था । पूरे दस थे । हवा का एक तेज झोंका आया । उन दस में से एक फड़फड़ाता हुआ उसके दरवाजे के पास आ गया । देखा तो नक्‍की हो गया,  वो नोट ही हैं । गांधीजी का चश्‍मा पहने हुए फोटो एकदम क्लिअर दिखाई दे रहा था । बस एक बार थोड़ी तेज हवा चल जाऐ और नोट पलट जाये,  तो पक्‍का उसके पीछे लाल किला ही होगा ।  ऊपरवाले ने उसकी सुनी । हवा चली । नोट पलटा । लाल किला दिखा । कनफर्म हो गया पांच सौ का नोट है ।
उसके मन में शंका ने जन्‍म लिया, कहीं चूरन छाप नोट तो नहीं ? कोई दिल्‍लगी तो नहीं कर रहा । लॉकडाउन में एवईं टाइम पास के लिए किसी ने खिड़की से फेंक दिये हों, और  चुपके से देख रहा हो कि कौन बेवकूफ बनता  है । भला ऐसे कोई सच्‍ची-मुच्‍ची का नोट काहे को सड़क पर फेंकेगा ? उसे याद आया एक बार सिंह साहब के घर के बाहर कचरे में नोट पड़े हुए मिले थे । हड़कम्‍प मच गया था ।  बाद में पता चला उनके यहां इनकम टेक्‍स की रेड पड़ी थी ।
पर इस समय जठर अग्नि को शांत करना उसकी प्राथमिकता थी  । भूख से बेहाल था परिवार  । सरकारी खाने के पेकेट दो दिन से बंद हैं । डिलिवरी बॉय पॉजिटिव निकला ।  वो सोचने लगा नोट उठा भी लूंगा तो किस काम का ? दूकानें बंद । रास्‍ते बंद । पेट की भूख नोटों से शांत नहीं होनेवाली । उसने फील किया कि उसे माया से वितृष्‍णा होने लगी ।
बापू भूख लगी है..” उसका  बेटा दरवाजे के पास आकर बोला । बेटे की नजर नोट पर पड़ी । वो लपका । चीखा । बापू देखो ये क्‍या है । नोट बेटे के हाथ में था । सामने पुलिस चौकी पर पुलिसवाला जो अभी तक पीठ करके बैठा था, पलटा । सड़क पर बिखरे नोट देखते ही पुलिसवाला हरकत में आ गया । हाथों में दस्‍ताने पहने  वो एक-एक नोट को बड़े जतन से उठाने लगा । मानो लेंडमाइन के बमों का डिफ्यूज कर रहा हो ।  उसने बेटे से संभावित कोरोना संक्रमित नोट लेकर पन्‍नी में रख लिया । पुलिसवाला कड़क आवाज में स्‍लोगन बोला  घर में रहो । सुरक्षित रहो । घर में  भूख और पैसे के बीच संघर्ष जारी था ।
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रविवार, 26 अप्रैल 2020

कहानी - ‘कितने दूर कितने पास ’



कहानी  
कितने दूर कितने पास
-: सुनील सक्‍सेना

 सुधा सुबह के नाश्‍ते के लिए किचन में भजिये की तैयारी में जुटी थी । किचन से किसी डब्‍बे की गिरने की आवाज आई । कहीं बेसन का डब्‍बा तो नहीं गिरा ? यदि मेरा शक सही हुआ तो ये सीधा संकेत था कि बेसन खत्‍म हो गया है । अब लॉकडाउन में भजिए की फरमाइश बंद करिए । राशन का पुराना स्‍टॉक खत्‍म होता जा रहा है । फिर भी तसल्‍ली के लिए मैंने पूछ लिया – क्‍या गिरा  मेडम ?
 बेसन का डब्‍बा…”
 “यानी भजिए केंसिल ?”
 “नहीं बाबा थोड़ा बचा था मैंने पहले ही निकाल लिया था…”
 “थेंक्‍स गॉड । वरना दो दिन पुरानी ब्रेड खिलातीं तुम आज नाश्‍ते में…”

मैं ड्राइंग रूम में प्‍याज काट रहा हूं । मुझे प्‍याज काटने का कोई पूर्व अनुभव नहीं है । घर में सबसे बड़ा था । अम्‍मा ने किचन में कभी घुसने नहीं दिया । एकाध बार कोशिश भी की तो अम्‍मा ने बुरी तरह हड़काया – लड़कों का क्‍या काम रसोई में । अम्‍मा की फटकार सुनते ही मेरी दोनों छोटी बहनें रसोई में दौड़ी चली आतीं ।  आप भी न भैया अम्‍मा से जबरदस्‍ती डांट पड़वाते हो । शैफ बनने का भूत सवार है रहता है आपको ।  किसने कहा था किचन में जाने को ।

 एक प्‍याज अभी भी बाकी है काटने के लिए । अम्‍मा टीवी पर रामायण देख रही हैं । तुम आ गये हो नूर आ गया है नहीं तो चरागों से लौ जारही थी ...आंधी फिल्‍म का ये गाना जब कानों में सुनाई पड़ा तो मैंने प्‍याज के आंसुओं से लबालब दोनों आंखों को आस्‍तीन से पोंछते हुए कहा -  अम्‍मा ये रामायण देखते - देखते आप कहां फिल्‍म चैनल पर चली गईं  ?”

बेटा मैं तो रामायण ही देख रही हूं । ये सुधा की आवाज है । वो गा रही है । जब तेरे लिए सुधा को देखने गये थे तो उसने बड़ा सुंदर भजन सुनाया था । मैंने उसकी सुरीली तान सुनते ही तेरे लिए फाइनल कर दिया था । अब तुझे नौकरी से  फुरसत मिले तो पता चले कि सुधा कितना अच्‍छा गाती है । पागलों की तरह दिन- रात दौड़ता रहता है । चैन कहां है तुझे । ऐसी भी क्‍या नौकरी । वो तो भला हो लॉकडाउन का और तेरे वर्क फ्रॉम होम का जो घर में टिका है तू ।  टीवी पर सीता स्‍वयंवर चल रहा था । अम्‍मा ने अपनी बात कहने के लिए टीवी का साउंड म्‍यूट कर दिया था ।

मन हुआ किचन में जाकर सुधा से कहूं – “यार क्‍या कमाल का गाती हो..” पर मुझे पता है वो ताना मारेगी – “जनाब को दस साल बाद पता चला मेरे इस हुनर का…” । मैं खामोशी से अंतिम बचे प्‍याज  को काटने में लग गया । सोच रहा था कि जीवन की इस आपाधापी में कितना कुछ छूट जाता है । कितनी चीजें अनदेखी रह जाती हैं । कितना कुछ अनसुना रह जाता है । किसी और का नहीं अपनों का ।  आंखों से प्‍याज वाले आंसू नाक के पास से गुजरते हुए होंठों तक आ गये । जबान फेरी तो हल्‍के नमकदार हो गए थे आंसू ।

तभी परी दौड़ती हुई मेरे पास आई । उसके हाथ में ड्राइंग शीट थी ।
पापा ये देखो मेरी ड्राइंग
दिखाओ भाई हमारी परी ने क्‍या बनाया है..” ड्राइंग शीट मेरे हाथ में थी ।
ये जो गोल गोल है न हमारी अर्थ है । परी ने दोनों हाथों को गोलाकार फैलाते हुए कहा ।    और ये अर्थ के ऊपर जो छोटी-छोटी चोटीसी हैं न ये कोरोना है । ये नीचे जो इत्‍ते सारे लोग खड़े हैं, इसमें आप, मम्‍मी, दादी और मैं भी हूं । यानी हम सब । हमारा इंडिया । परी किसी कुशल चित्रकार की तरह मुझे अपनी रचना समझा रही थी  ।  मैं कभी ड्राइंग को कभी परी को विस्मित निगाहों से देख रहा था । सोच का उम्र से कोई नाता नहीं होता है ।  

पापा आपने पूछा नहीं इस ड्राइंग का मैंने क्‍या नाम रखा है ?”
क्‍या ?”
 हम होंगे कामयाब । अब बताओ कैसी लगी मेरी ड्राइंग पापा ?”
बहुत सुंदर । पर हमारी परी ने तो कभी बताया नहीं कि वो इतनी अच्‍छी ड्राइंग बना लेती     है..”
मैं तो रोज बनाती हूं । पर आप तो रात को लेट आते हो ऑफिस से । तब तक मैं सो जाती हूं । आपको कैसे पता चलेगा..”
मेरी प्‍यारी बिटिया परी  मैंने परी को सीने से लगा लिया ।

नाश्‍ते के लिए सुधा, अम्‍मा, परी और मैं सब ड्राइंग रूम में एक साथ बैठे थे । मुझे याद नहीं ऐसा पहले कब हुआ ।  रामायण का एपिसोड खत्‍म होने को है । प्रसारण बीच में रूक गया । ब्रेकिंग न्‍यूज । सरकार ने देश में लॉकडाउन का समय पन्‍द्रह दिन और बढ़ाया । अम्‍मा ने पलट कर मुझे देखा । सुधा कनखियों से देखकर मुस्‍करा रही थी । परी मेरे गले से लिपट गई ।

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शनिवार, 25 अप्रैल 2020

अंत्येष्टि का ड्रेसकोड


                           पिछले कई दिनों से मौत की खबरें जिस  रफतार से आ रही हैं, आजकल  जब भी  सुबह-सुबह मोबाईल की घंटी बजती है तो  मन में खटका लगा रहता है कि जरूर फिर कोई इस फानी दुनिया से कूच कर गया । आज सुबह जब मोबाइल की घंटी  घनघनाई और प्रिय मित्र का नंबर देखा तो लगा कि आज भी ये कोई  मनहूसियत भरी खबर सुनायेगा । दरअसल मेरे प्रिय मित्र का  पी.आर. शहर में बहुत अच्‍छा है । शहर में कोई जन्‍मदिन हो , मुंडन  हो,  सगाई हो,  विवाह हो, बीमारी हो,  उठावना हो मेरा प्रिय मित्र आपको एक अच्‍छे शुभचिंतक की तरह हर जगह मिल जायेगा ।  चूंकि अपना प्रिय मित्र है इसलिए बेचारा बगैर कोई चूक किये शुभ- अशुभ समाचार की सूचना  मुझे सबसे पहले  देता है । अपन भी आदमी  देखकर अच्‍छे-बुरे में शामिल हो लेते  हैं । कहते हैं एक बार आप किसी के अच्‍छे काज  में जाओ न जाओ पर बुरे वक्‍त में जरूर शरीक होना चाहिए । इसी फलसफे को अमल करते हुए गये एक हफते में तीन शवयात्राओं में शामिल हो चुका हूं । प्रिय मित्र हमारी  मोटरसाइकल पर लद लेता है ।  पेट्रोल के पैसे बचाता है और  पुण्‍याई कमा लेता है । अपना स्‍वार्थ बस इतना होता है कि प्रिय मित्र के साथ एैसे  मौकों पर चिपक लेने से उन बड़े लोगों के दर्शन हो जाते हैं जिन्‍हें आमतौर पर देखना नसीब नहीं होता । श्‍मशान ही एक ऐसी  जगह है जहां कई अकड़ी गरदनवाले आपको झुकी गरदन किये हुए मिल जायेंगे ।   एैसे मौकों पर आप उनका सान्निध्‍य पा सकते हैं ।  उनके नजदीक खड़े हो सकते हैं  और   चांस लग जाये तो आप उनसे बतिया भी सकते हैं । ये श्‍मशान का वैराग्‍य है ही ऐसी चीज । श्‍मशान का वैराग्‍य भले ही कुछ समय के लिए आपकी देह में प्रवेश करता है, परंतु अच्‍छे- अच्‍छे सूरमाओं को कुछ देर के लिए धरातल पर ले आता है । बंदा कुछ समय  के लिए छोटे- बड़े, अगड़े- पिछड़े का  भेदभाव भूल स्‍वीकार कर लेता है कि गुरू आना तो सबको यहीं है ।
                            तो  जैसा  सोचा था शंका सच निकली । हमारे नगर के प्रतिष्ठित बहुमुखी प्रतिभावाले आनंद बाबू गुजर गये । प्रिय  मित्र ने अंत्‍येष्टि  के समय की  सूचना के साथ अंत में एक हिदायत दी  कि भैया सुबह-सुबह यूं उंघते हुए न चले आना । मरने वाला  बड़ा  आदमी था । शवयात्रा में नामीगिरामी लोग होंगे तो अंत्‍येष्टि  में  ड्रेसकोड का ज़रा ख्‍याल रखना  । मैंने कहा -  भाई मातम में कैसा ड्रेसकोड ?’ प्रिय मित्र बोला-‘ होता है भाई.. जब कोई बड़ा मरता है तो  सफेद कुरता  पायजाम पहनकर ही जाने का रिवाज  है । और धूपवाला चश्‍मा भी पहनते हैं । इसलिए कह रहा हूं ड्रेसकोड ख्‍याल रखना ।    मैंने कहा-   यार ये ड्रेसकोड का  लफड़ा - अफड़ा मत डालो ।  मरने वाला तो मरकर चला गया अब क्‍या सफेद और क्‍या रंगीन । वो क्‍या कोई देखने आने वाला है । प्रिय मित्र बोला -   अच्‍छा नहीं लगता यार । बड़े  आदमी  की मैयत में जा रहे हो  यूं रंगीन कपड़े पहनकर जाओगे तो लोग  क्‍या सोचेंगे कि साला पिकनिक पर आया है । ध्‍यान रखो एैसे मातमी अवसरों पर  आपकी बॉडी लेंग्‍वेज कैसी भी हो, आपके चेहरे पर उदासी हो न हो आपकी पोशाक ज़रूर  सफेद होनी चाहिए । जानाकारों का कहना है कि शोक प्रदर्शन में आपके आंसुओं से ज्‍यादा वजन आपकी सफेद पोशाक का होता है । और धूपवाला चश्‍मा तो ज़रूर पहनो । चश्‍मे की आड़ में  आप टसुऐ बहाएं या न बहाएं कोई फर्क नहीं पड़ता । आपकी आंखों को आपकी ही चुगली करने से रोकता है ये चश्‍मा  ।
                          मैं बड़ी  दुविधा में था । प्रिय मित्र को कैसे बताऊं कि भैया सफेद कपड़ों को मेंटेन करना अपनी औकात के बाहर है । सो अपन तो  रंगीन ही पहनते हैं  । हफतों रगड़ो  कोई फर्क नहीं पड़ता । कोई खर्चा भी  नहीं होता  । और जहां तक चश्‍मे का सवाल है तो अपने पास चश्‍मे के नाम  पर बस एक अदद नजरवाला चश्‍मा है ।    उम्र का तकाजा है सो मजबूरी में पहनना पड़ता है  ।  बरबस ही ख्‍याल आया कि पड़ौसवाले  भैयाजी छात्र जीवन से ही कड़क कलफदार कुरता पायजामा पहनते आ रहे हैं । अक्‍सर धरने, प्रदर्शन,  आंदोलनों  में भी जाते रहते  हैं तो उनके पास जरूर  होगा । यूं तो मांगने की अपनी आदत नहीं । पर प्रिय मित्र ने  ड्रेसकोड का पचड़ा  ऐसा डाल रखा था सो  हिम्‍मत  कर मैंने भैयाजी के घर  फोन लगा ही दिया  । भैयाजी की श्रीमतीजी यानी अपनी भाभी जी फोन पर थीं  । मैंने कहा-  भाभी जी भैयाजी का कोई  सफेद कुरता  पायजमा मिल जायेगा । मुझे एक प्रोग्राम में जाना है ।  भाभी जी बोलीं-  एक नहीं ढेरों कुरते  पायजमे हैं भाई साब लेकिन वो अब इस लायक नहीं रहे हैं कि आप जैसे लोग इस्‍तेमाल कर सकें ।  सब दागदार हो गये हैं ।

                      आपके किसी काम के नहीं हैं । भाभी जी की इस साफगोई पर मैं तो  फिदा हो गया । बस इतना ही कह सका आप किस जमाने में जी रही हैं भाभी जी आजकल तो हर कोई कहता है दाग अच्‍छे हैं ।  मन में आया कि अंत्‍येष्टि  में जाने का आइडिया ही ड्राप कर दूं । फिर लगा क्‍यों न प्रिय मित्र से ही कहूं तू ने ही मर्ज दिया है अब तू ही दवा कर । मैंने कहा-  गुरू सफेद कुरता  पायजाम तो नहीं मिल रहा है । तेरे पास एकाध एक्‍सट्रा हो तो मेरा काम चल जायेगा । वो  बोला अच्‍छा याद दिलाया भाई अभी  एक नगर सेठ  के  तेरहवें में शामिल हुआ था । रिर्टन गिफट के तौर एक पॉकेट गीता और सफेद कुरता  पायजामा  मिला था । तू रूक में अभी  लेकर घर पहुंचता हूं । पर लगता है इस अंत्‍येष्टि के ड्रेसकोड के चक्‍कर में आनंद बाबू की अंतिम यात्रा  में मैं शामिल नहीं हो पाऊंगा । प्रिय मित्र का कुरता  पायजामा मुझे छोटा पड़  गया है । दर्जी को सफेद कुरता पायजामा का  नाप दे दिया है । धूपवाला चश्‍मा भी ले लिया है  ताकि अगली बार फिर किसी बड़े  की अंत्‍येष्टि  ड्रेसकोड के चक्‍कर में मिस न करूं ।