गुरुवार, 15 मार्च 2012

गन्दा है पर "चंदा" है

मेरा DNA मे प्रकाशित नया व्यंग्य
अपना तो पूरा साल किसी न किसी मौके पर चंदा देते हुए ही निकल जाता है ।  होली का चंदा, दिवाली का चंदा, गणेश जी का चंदा, दुर्गापूजा का चंदा । यानी जैसे ही त्‍यौहारों का मौसम आता है, इन चंदा मांगनेवालों का धंधा जोरों  पर चलने लगता है और अपनी जेब ढीली होने लगती है  । गली-मोहल्‍ले के शोहदे चंदे के रसीद कट्टे बगल में दबाये झुंड के साथ चंदा मांगने निकल पड़ते हैं ।  इस तेवर के साथ कि - बेटा सीधे-सीधे चंदा दे दो वरना मोहल्‍ले में कंजूस-मख्‍खीचूस के रूप में कुख्‍यात करने में उन्‍हें तनिक भी  देर नहीं लगेगी । और बात जब होली के चंदे की हो तो अपनी लानत-मलामत के डर से अच्‍छे-अच्‍छे सूरमा अपनी अंटी ढीली कर देते हैं ।
               चंदा वसूली का ये धंधा त्‍यौहारों तक ही सीमित होता  तो भी गनीमत थी । हालात ये हैं कि चंदा मांगनेवाले कोई भी अवसर नहीं चूकते । वार्ड के चुनाव हों तो पानवाले से चंदा,  विधान सभा के चुनाव हों तो नगर सेठ से चंदा,  लोकसभा चुनाव हो तो बिरला- टाटा- अंबानी से चंदा । और जब देश कंगाली की कगार पर पहुंच जाये तो आइ.एम.एफ.  तक से चंदा मांगने में ये कोई गुरेज नहीं करते ।
               चंदा मांगनेवाली इस प्रजाति का दुष्‍प्रभाव  मुझ पर कुछ  इस कदर हुआ कि अब आलम ये है कि चंदा शब्‍द मेरी चिढ़ान  हो गई है । इन  नामुराद चंदेवालों की चंदा उगाही से नफरत के चक्‍कर में कम्‍बखत अपनी चंदा ने भी अब अपने ख्‍वाबों में आना छोड़ दिया है । आपको भले ही चंदामामा में सूत कातती चरखे वाली बुढ़िया नजर आती हो मुझे तो हर पूरनमासी को चांद एक कटोरा लगता है जो तारों के शहर में कटोरा लिये चंदा मांगने निकल पड़ा हो ।
                वैसे इस बार मैंने ठान लिया था कि होली पर चंदा नहीं दूंगा । अब भला ये भी कोई बात हुर्ई कि आप हमारे गाढ़े खून-पसीने की कमाई से चंदा ले जायें और हमारे ही सामने उसी पैसे से गुलछर्रे उडायें । लेकिन साहब जवाब नहीं हमारे मोहल्‍ले के छोकरों की कन्विंसिंग पॉवर का । ऐसा लगा जैसे किसी  नेशनल इंस्‍टीटूयट ऑफ चंदा उगाही केन्‍द्र  से विधिवत प्रशिक्षित हों ।  दो मिनिट में ही मुझे चंदा देने के लिए मजबूर दिया । ग्‍यारह,  इक्‍कीस नहीं पूरे एक सौ एक रूपये झटक लिये ।


              वही हुआ जैसा सोचा था ।  रात नुक्‍कड़ पर बाइक पर सवार बियर की बोतलें लिये  चंदा कलेक्‍टर्स  होलीका दहन का लुत्‍फ ले रहे थे । मैंने एक बार फिर कसम खाई चंदा न देने की । ये किसी शोहदे की ही आवाज थी।  क्‍या सोच रहे हैं अंकल ...? किस बात का मलाल कर रहे हैं ...? चंदे का धंधा सर्वव्‍यापी है.. दुनिया चंदे पर चल रही है । आप नाहक परेशान हो रहे हैं ।  होली  है.. मौका भी है.. दस्‍तूर भी है बियर भी चिल्‍ड है.. एक घूटंमार लें अंकल । कलेजे को ठंडक मिल जायेगी । वैसे बुरा लगा हो तो माफ करना अंकल । होली है भई होली है.. बुरा न मानो होली है ।
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