"दाना"

कहानी, व्यंग्य, और कविताओं के इस ब्लॉग में आपका स्वागत है । यहां आपको पौष्टिक बौद्धिक खुराक देने का मेरा प्रयास रहेगा । “दानारा” यक इशारा काफियस्त‍” फारसी में कहा है और हिंदी में “अक्लमंद को एक इशारा ही काफी है” । मेरी रचनाएं भी आप जैसे दानिशमंद पाठकों के लिए “इशारा” मात्र हैं । आनंद लें । अपनी प्रतिक्रिया से अवगत करायें ये मेरी बेहतरी के लिए ये बेहद जरूरी है ।

सोमवार, 31 अगस्त 2020

व्‍यंग्‍य - “मैं दीये जलाता कैसे”

 


व्‍यंग्‍य

“मैं दीये जलाता कैसे”

-: सुनील सक्‍सेना

        मैं  हर दिन की तरह सुबह जब परिंदों को पीने के लिए पानी रखने छत पर आया तो देखा वे सूर्य देवता को अर्घ्‍य दे रहे थे । मैं मिट्टी के कटोरे  में पक्षियों की प्‍यास बुझाने के लिए पानी रखता हूं, वे रोज लोटा भर पानी छत पर बहाकर सूरज को अर्पित कर देते हैं ।

 उनका मानना है कि सदकर्म का प्रतिफल लेना ही है,  तो वाया-वाया जाने की क्‍या जरूरत है । सीधे देने वाले से सम्‍पर्क करो और मांग लो । वे डायरेक्‍ट डीलिंग में यकीन रखते हैं । इसलिए जब भी मैं बेजुबान पक्षियों के लिए पानी लेकर छत पर आता हूं तो वे मुझे उपहास भरे अंदाज में देखते हैं । ऐसा लगता है, जैसे वो मुझसे कह रहे हों “बेवकूफ इंसान इन चिडि़यों, कबूतरों को पानी पिलाने से कुछ नहीं होने वाला, प्‍यास बुझानी है तो उस ऊपरवाले की बुझा, जहां से कृपा बरसने वाली है ।”

हमारी और उनकी छत से छत मिली है, पर विचार नहीं मिलते हैं । हमारे वैचारिक मतभेद हैं । मेरा दर्शन और उनका शास्‍त्र मेल नहीं खाता । सही कहते हैं, दोस्‍त बदले जा सकते हैं, पर पड़ोसी नहीं । सो मैं पड़ोसी धर्म निभा रहा हूं ।

यूं तो हमारी राम-राम उनसे रोज होती थी । वे कुशलक्षेम भी पूछते थे । किंतु पिछले कुछ दिनों से नमस्‍कार-चमत्‍कार एकदम बंद है । पड़ोसी से अबोला या अनबन ज्‍यादा दिनों तक लंबी खिंच जाये, तो ठीक नहीं है । दोनों पक्षों में तनाव बढ़ जाता है । सियासत शुरू हो जाती है ।

मैं सोच रहा था कि मुझसे उनकी शान में क्‍या गुस्‍ताखी हो गई ? मैंने ऐसी कौनसी वादा खिलाफी कर दी कि वे ऐसे रूठे हुए हैं, जैसे किसी शोख-चंचल हसीना को किये वादे को पूरा न करने पर,  वो रूठ जाती है ।

मैंने पिछले दिनों उनके साथ बिताये पल, मुलाकातों को रिवाइंड किया तो पता चला जिस दिन “लला” के नए घर का भूमि पूजन हुआ था, उसके दूसरे दिन से ही वे रूसा गये हैं ।  

उन्‍हें गुड मॉर्निंग, नमस्‍कार या नमस्‍ते की अपेक्षा राम-राम ज्‍यादा अच्‍छा लगता है, सो जब वे अर्घ्‍य देकर फारिग हुए तो मैंने कहा -  “राम राम भाई साब… कैसे हैं ?”

“ठीक हूं ।” वे बोले

इतने संक्षिप्‍त उत्‍तर की मुझे अपेक्षा नहीं थी । मुझे लगा शायद “ठीक हूं” कहने के बाद वे पूछेंगे – “आप कैसे हैं ?”  पर उनके मुख्‍तसर जवाब से मैं समझ गया था कि हो न हो,  उन्‍हें मेरे किसी कृत्‍य से बहुत गहरी चोट पहुंची है । मुझे इस चुप्‍पी के रहस्‍य की तह तक पहुंचना था ।

मैंने सीधे-सीधे पूछ ही लिया - “लगता है आप नाराज हैं हमसे ? आजकल बात ही नहीं करते ठीक से । हां.. हूं.. में जवाब देकर खामोश हो जाते हैं आप ।”

वे थोड़ा सा खुले । “नाराजगी की बात ही है । उस दिन “लला” के नये आवास का भूमि पूजन हुआ । आपने रात में दीये क्‍यों नहीं जलाये ? न पटाखे चलाये..।”

मेरी ओर ये प्रश्‍न दागते ही उन्‍हें बड़ी रिलीफ मिली । बिल्‍कुल वैसी रिलीफ जब किसी बंदे को सिनेमा हॉल में घंटे भर से रोकी हुई लघुशंका को इंटरवेल में रिलीज करने पर मिलती है । 

“ओह !  तो इस बात को लेकर आप गुस्‍सा हैं । बस भाई साब,  उस दिन कुछ  मन ही नहीं हुआ ये सब करने का ।” मैंने उनके प्रश्‍न को टालते हुए कहा ।

वे बोले – “इससे पहले तो आपने जनता कर्फ्यू में हिस्‍सा लिया । एक दिन थाली, घंटी, शंख बजाये । नौ-नौ दीप भी जलाये । ये तो उससे भी बड़ा अवसर था, कितने संघर्ष के बाद “लला” को नया घर मिलने जा रहा है ।”   

मुझे ऐसा लगा जैसे वो स्‍वयं को “लला” का परमभक्‍त और सच्‍चा राष्‍ट्रवादी प्रतिपादित कर रहे हैं, और मेरी ईश्‍वर के प्रति निष्‍ठा को चुनौती देते रहे हैं  ।  

मैंने कहा – “भाई साब बड़ी मुश्किल से तो आपका मौन टूटा है । मैं कुछ कहूंगा तो आप फिर बुरा मान जायेंगे ।”

वे बोले- “नहीं..नहीं कहिए”  

मैंने भी सोचा सच कहने में डर कैसा । मुझे कौनसी बिटिया बिहानी है, उनके यहां ।  इसी बीच अचानक मुझे मुंशी प्रेमचंद की कहानी का संवाद भी याद आ गया “बिगाड़ के डर से ईमान की बात नहीं कहोगे ।”

मैंने कहा- “ऐसा है भाई साब, आप जिस दुनिया में रहते हैं न वो बड़ी छोटी है । आपका दौलतखाना और विरासत में मिला पुश्‍तैनी धंधा, इसके आगे आपने संसार में कुछ देखा ही नहीं ।”  

वे भड़क गये, बोले - “दुनियादारी की बात आप हमसे न करिये… आप क्‍या जाने बिजनेस क्‍या होता है । यहां रोज सैकड़ों से पाला पड़ता है । आपकी तरह दस से पांच की नौकरी नहीं करते हैं ।”

मैं भी दो-दो हाथ करने के मूड में था । मैंने कहा – “आरोग्‍य सेतु एप देखे हैं कभी । छोडिये, आप तो स्‍मार्ट फोन रखते ही नहीं है । आप क्‍या जानें । आपको मालूम है हमारी कॉलोनी में दस कोरोना पॉजिटिव हो गये हैं । चार घरों को सील कर दिया है । शहर में कितनों के मां, बाप, बच्‍चे अस्‍पताल में हैं । किसी को पता नहीं, जियेंगे या मरेंगे । हर पल मौत का डर ।  दहशत में जी रहे हैं ।

वो अपने शर्मा जी की कामवाली विमला, उसका आदमी दो महीने हो गये मुम्‍बई से चला था,  आज तक घर नहीं पहुंचा । पता नहीं जिंदा है या मर गया । विमला रोज उसके नाम का सिंदूर मांग में भरती है,  इस उम्‍मीद से कि उसका आदमी लौटकर आयेगा ।

गुप्‍ता के लड़के की नौकरी चली गई । इकलौता कमाने वाला था घर में । खाने के लाले पड़ रहे हैं ।

राधेश्‍याम तिवारी दो महीने पहले रिटायर हुए थे, उनकी की पेंशन सरकार ने रोक दी । तनख्‍वाह बंद । पता नहीं पेंशन मिलेगी भी या नहीं,  ये सोच-सोच कर वो डिप्रेशन में चले गये ।

बंसल ने बेटे को बेंक से लोन लेकर दुकान खुलवाई । उदघाटन के दूसरे दिन से दूकान बंद पड़ी है, लॉकडाउन के चक्‍कर में । आमदानी बंद । बैंक लोन की किश्‍तें चालू हैं । किस-किस का दर्द बयां करूं मैं आपको ।

            इतनी दुश्‍वारियों के बीच किसका मन करेगा उत्‍सव मनाने का । भाई साब आप ही बताओ कोई कैसे दीप जलाये ।

उन्‍होंने अपने कान की दोनों लौ को छुआ, हल्‍की सी जबान बाहर निकाली आसमान की ओर देखा और चले गये ।  पता नहीं वो ऊपरवाले से किसके लिए माफी मांग रहे थे । मेरे लिए या स्‍वयं अपने लिए ।

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प्रस्तुतकर्ता Sunil "Dana" पर 2:04 pm
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