शनिवार, 25 अप्रैल 2020

अंत्येष्टि का ड्रेसकोड


                           पिछले कई दिनों से मौत की खबरें जिस  रफतार से आ रही हैं, आजकल  जब भी  सुबह-सुबह मोबाईल की घंटी बजती है तो  मन में खटका लगा रहता है कि जरूर फिर कोई इस फानी दुनिया से कूच कर गया । आज सुबह जब मोबाइल की घंटी  घनघनाई और प्रिय मित्र का नंबर देखा तो लगा कि आज भी ये कोई  मनहूसियत भरी खबर सुनायेगा । दरअसल मेरे प्रिय मित्र का  पी.आर. शहर में बहुत अच्‍छा है । शहर में कोई जन्‍मदिन हो , मुंडन  हो,  सगाई हो,  विवाह हो, बीमारी हो,  उठावना हो मेरा प्रिय मित्र आपको एक अच्‍छे शुभचिंतक की तरह हर जगह मिल जायेगा ।  चूंकि अपना प्रिय मित्र है इसलिए बेचारा बगैर कोई चूक किये शुभ- अशुभ समाचार की सूचना  मुझे सबसे पहले  देता है । अपन भी आदमी  देखकर अच्‍छे-बुरे में शामिल हो लेते  हैं । कहते हैं एक बार आप किसी के अच्‍छे काज  में जाओ न जाओ पर बुरे वक्‍त में जरूर शरीक होना चाहिए । इसी फलसफे को अमल करते हुए गये एक हफते में तीन शवयात्राओं में शामिल हो चुका हूं । प्रिय मित्र हमारी  मोटरसाइकल पर लद लेता है ।  पेट्रोल के पैसे बचाता है और  पुण्‍याई कमा लेता है । अपना स्‍वार्थ बस इतना होता है कि प्रिय मित्र के साथ एैसे  मौकों पर चिपक लेने से उन बड़े लोगों के दर्शन हो जाते हैं जिन्‍हें आमतौर पर देखना नसीब नहीं होता । श्‍मशान ही एक ऐसी  जगह है जहां कई अकड़ी गरदनवाले आपको झुकी गरदन किये हुए मिल जायेंगे ।   एैसे मौकों पर आप उनका सान्निध्‍य पा सकते हैं ।  उनके नजदीक खड़े हो सकते हैं  और   चांस लग जाये तो आप उनसे बतिया भी सकते हैं । ये श्‍मशान का वैराग्‍य है ही ऐसी चीज । श्‍मशान का वैराग्‍य भले ही कुछ समय के लिए आपकी देह में प्रवेश करता है, परंतु अच्‍छे- अच्‍छे सूरमाओं को कुछ देर के लिए धरातल पर ले आता है । बंदा कुछ समय  के लिए छोटे- बड़े, अगड़े- पिछड़े का  भेदभाव भूल स्‍वीकार कर लेता है कि गुरू आना तो सबको यहीं है ।
                            तो  जैसा  सोचा था शंका सच निकली । हमारे नगर के प्रतिष्ठित बहुमुखी प्रतिभावाले आनंद बाबू गुजर गये । प्रिय  मित्र ने अंत्‍येष्टि  के समय की  सूचना के साथ अंत में एक हिदायत दी  कि भैया सुबह-सुबह यूं उंघते हुए न चले आना । मरने वाला  बड़ा  आदमी था । शवयात्रा में नामीगिरामी लोग होंगे तो अंत्‍येष्टि  में  ड्रेसकोड का ज़रा ख्‍याल रखना  । मैंने कहा -  भाई मातम में कैसा ड्रेसकोड ?’ प्रिय मित्र बोला-‘ होता है भाई.. जब कोई बड़ा मरता है तो  सफेद कुरता  पायजाम पहनकर ही जाने का रिवाज  है । और धूपवाला चश्‍मा भी पहनते हैं । इसलिए कह रहा हूं ड्रेसकोड ख्‍याल रखना ।    मैंने कहा-   यार ये ड्रेसकोड का  लफड़ा - अफड़ा मत डालो ।  मरने वाला तो मरकर चला गया अब क्‍या सफेद और क्‍या रंगीन । वो क्‍या कोई देखने आने वाला है । प्रिय मित्र बोला -   अच्‍छा नहीं लगता यार । बड़े  आदमी  की मैयत में जा रहे हो  यूं रंगीन कपड़े पहनकर जाओगे तो लोग  क्‍या सोचेंगे कि साला पिकनिक पर आया है । ध्‍यान रखो एैसे मातमी अवसरों पर  आपकी बॉडी लेंग्‍वेज कैसी भी हो, आपके चेहरे पर उदासी हो न हो आपकी पोशाक ज़रूर  सफेद होनी चाहिए । जानाकारों का कहना है कि शोक प्रदर्शन में आपके आंसुओं से ज्‍यादा वजन आपकी सफेद पोशाक का होता है । और धूपवाला चश्‍मा तो ज़रूर पहनो । चश्‍मे की आड़ में  आप टसुऐ बहाएं या न बहाएं कोई फर्क नहीं पड़ता । आपकी आंखों को आपकी ही चुगली करने से रोकता है ये चश्‍मा  ।
                          मैं बड़ी  दुविधा में था । प्रिय मित्र को कैसे बताऊं कि भैया सफेद कपड़ों को मेंटेन करना अपनी औकात के बाहर है । सो अपन तो  रंगीन ही पहनते हैं  । हफतों रगड़ो  कोई फर्क नहीं पड़ता । कोई खर्चा भी  नहीं होता  । और जहां तक चश्‍मे का सवाल है तो अपने पास चश्‍मे के नाम  पर बस एक अदद नजरवाला चश्‍मा है ।    उम्र का तकाजा है सो मजबूरी में पहनना पड़ता है  ।  बरबस ही ख्‍याल आया कि पड़ौसवाले  भैयाजी छात्र जीवन से ही कड़क कलफदार कुरता पायजामा पहनते आ रहे हैं । अक्‍सर धरने, प्रदर्शन,  आंदोलनों  में भी जाते रहते  हैं तो उनके पास जरूर  होगा । यूं तो मांगने की अपनी आदत नहीं । पर प्रिय मित्र ने  ड्रेसकोड का पचड़ा  ऐसा डाल रखा था सो  हिम्‍मत  कर मैंने भैयाजी के घर  फोन लगा ही दिया  । भैयाजी की श्रीमतीजी यानी अपनी भाभी जी फोन पर थीं  । मैंने कहा-  भाभी जी भैयाजी का कोई  सफेद कुरता  पायजमा मिल जायेगा । मुझे एक प्रोग्राम में जाना है ।  भाभी जी बोलीं-  एक नहीं ढेरों कुरते  पायजमे हैं भाई साब लेकिन वो अब इस लायक नहीं रहे हैं कि आप जैसे लोग इस्‍तेमाल कर सकें ।  सब दागदार हो गये हैं ।

                      आपके किसी काम के नहीं हैं । भाभी जी की इस साफगोई पर मैं तो  फिदा हो गया । बस इतना ही कह सका आप किस जमाने में जी रही हैं भाभी जी आजकल तो हर कोई कहता है दाग अच्‍छे हैं ।  मन में आया कि अंत्‍येष्टि  में जाने का आइडिया ही ड्राप कर दूं । फिर लगा क्‍यों न प्रिय मित्र से ही कहूं तू ने ही मर्ज दिया है अब तू ही दवा कर । मैंने कहा-  गुरू सफेद कुरता  पायजाम तो नहीं मिल रहा है । तेरे पास एकाध एक्‍सट्रा हो तो मेरा काम चल जायेगा । वो  बोला अच्‍छा याद दिलाया भाई अभी  एक नगर सेठ  के  तेरहवें में शामिल हुआ था । रिर्टन गिफट के तौर एक पॉकेट गीता और सफेद कुरता  पायजामा  मिला था । तू रूक में अभी  लेकर घर पहुंचता हूं । पर लगता है इस अंत्‍येष्टि के ड्रेसकोड के चक्‍कर में आनंद बाबू की अंतिम यात्रा  में मैं शामिल नहीं हो पाऊंगा । प्रिय मित्र का कुरता  पायजामा मुझे छोटा पड़  गया है । दर्जी को सफेद कुरता पायजामा का  नाप दे दिया है । धूपवाला चश्‍मा भी ले लिया है  ताकि अगली बार फिर किसी बड़े  की अंत्‍येष्टि  ड्रेसकोड के चक्‍कर में मिस न करूं ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आपके विचार