रविवार, 3 मई 2020

हास्‍य- व्‍यंग्‍य - विकास के साइड इफेक्‍ट




हास्‍य- व्‍यंग्‍य
विकास के साइड इफेक्‍ट
-: सुनील सक्‍सेना
हम विकासशील हैं । विकसित होने की ओर अग्रसर हैं । विकास किसको अच्‍छा नहीं लगता । पर विकास के साथ  लोचा है । जब विकास होता है तो कुछ खोना भी पड़ता है । अर्थव्‍यवस्‍था मजबूत हुई । रूपया मजबूत हुआ । चवन्‍नी गायब हो गई । इंसान टेस्‍ट टयूब से पैदा होने लगे,  इंसानियत चली गई । अब मानव के क्रमिक विकास की श्रृंखला में एक जीवशास्‍त्री घोर अनुसंधान के बाद इस नतीजे पर पहुंचा है कि भविष्‍य में मनुष्‍य के बत्‍तीस नहीं अठ्ठाइस दांत होंगे ।
वैसे सच पूछिये तो मैंने कभी गिनने का प्रयास नहीं किया कि कितने हैं ।  गुणीजनों ने कहा तो  मान लिया बिना किसी बहस मुबाहिसे के कि हां.. भई बत्‍तीस ही होते हैं । ठीक वैसे ही जैसे स्‍कूल में गुरूजी गणित के सवाल हल  कराते समय कहते थे – “मान लो मोहन का एक बगीचा है ।  उसमें आम के दस पेड़ हैं । हम बिना किसी हुज्‍जत के स्‍वीकार कर लेते थे ।
              शोधकर्ताओं ने इन अठ्ठाइसदांतों की वजह के लिए दलील दी है कि जिन अंग-प्रत्‍यंगों  का मानव उपयोग करना बंद कर देता है,  कालांतर में वे  समाप्‍त हो जाते हैं ।  बिल्‍कुल सरकारी बजट की तरह । यूज नहीं किया तो बजट लेप्‍स । क्रेडिट कार्ड के बोनस पाइंट की तरह,  अगर रिडीम नहीं किये तो पॉइंट खत्‍म ।  ठीक उस पूंछ की तरह जो परमात्‍मा ने हमें दी थी कि बंदा खुद भले ही कितना गंदा हो, कम से कम जिस जगह पर  बैठगा,  उसे अपनी  दुम से साफ करके बैठेगा । हमने  दुम का दुरूपयोग किया  । हमें दुम हिलाने की आदत पड़ गई । दुम हट गई ।  दंत विशेषज्ञ कहते हैं कि अब अक्‍कल दाढ़ भी नहीं निकलती । शायद हमने अक्‍कल का इस्‍तेमाल करना  भी बंद कर दिया है 
अब कौन जाने विधाता ने अठ्ठाइस  दांतों का डिसीजन भी इस बिना पर लिया हो कि भई अखरोट खाने की तेरी औकात नहीं, गन्‍ना तू दांतों से  छील न सके । लोहे के चने चबवा देनेवाली नस्‍लें पैदा होना  बंद हो गईं । तो बत्‍तीस दांत का करेगा क्‍या तू ? वैसे भी तुझे तो पिज्‍जा खाना है,  नूडलल्‍स खाना है, तो अठ्ठाइसदांत काफी हैं । बचे चार दांत किसी जरूरतमंद को दूंगा, कम से कम आभारी रहेगा ।   
कुछ देर के लिए मान लीजिए कि ये जैविक खोज सच निकल है तो सबसे अहम सवाल ये होगा कि वो चार दांत होंगे कौन से ? क्‍या इन चार में दाढ़ों को शामिल किया है अथवा इन्‍हें कोई छूट दी गई है । क्‍या वो इंटेक्‍ट रहेंगी ?  यदि नहीं,  तो चलो ठीक है एकाध दाढ़ कम भी हो तो  बंदा  कुछ चबा लेगा, कुछ लील लेगा । गुजारा कर लेगा । पर यदि इन कम होनेवाले चार दांतों  का अभिप्राय दांत मात्र से है,  तो कल्‍पना कीजिए  मोती जैसी दंत पंक्ति में जब ऊपर के दो और नीचे के दो दांत नहीं होंगे तो हमारा  मुखमंडल  कैसा  होगा । रूप, सौंदर्य, चांद सा चेहरा,  श्रंगार रस की तो धज्जियां उड़ जायेंगी । 
तनिक सोचिए दांतों से जुड़ी उपमाओं और विशेषणों क्‍या हश्र होगा ? क्‍या हम खिसयाते हुए अपनी बत्‍तीसी  दिखा पायेंगे ? क्‍या हम अपने  पौरूष प्रदर्शन  में किसी की एक ही झापड़ में बत्‍तीसी बाहर कर पाएंगे ? साहित्‍य में बत्‍तीस दांतों से जुड़ी वो तमाम कहावतें, मुहावरे, उक्तियां सब स्‍क्रेप हो जायेंगी  
पर चिंता की बात नहीं है । घबराये नहीं । वैज्ञानिक हैं । उनका काम है रिसर्च करना । रोजी-रोटी है उनकी ।  हर रिसर्च सच साबित हो ये जरूरी तो नहीं ।  मौसम वैज्ञानिक जब  घोषणा करते हैं कि दिन में गरज के साथ छींटे  पड़ेंगे, उस दिन  मस्‍त धूप खिलती है । भूल-चूक हो सकती है । इसलिए चिल रहिए ।  लॉकडाउन एंजॉय कीजिए ।
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10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत टिका टिका कर लपेट लपेट कर धोया है आपने | बहुत ही गजब शैली में लिखते हैं आप महाराज

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  2. लोहे के चने चबवा देनेवाली नस्‍लें पैदा होना बंद हो गईं ।बेहतरीन👍👍

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  3. भूल-चूक हो सकती है । इसलिए चिल रहिए । लॉकडाउन एंजॉय कीजिए ।
    सही है !

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    1. संगीता जी लॉकडाउन एन्जॉय करने के अतिरिक्त कोई विकल्प भी नहीं बचा है

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  4. विकास के क्रियाचक्र का बहुत सही विश्लेषण किया सर आपने।

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  5. बहुत बढ़िया, सामयिक हास्य व्यंग्य.

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