सोमवार, 1 जून 2020

हास्‍य व्‍यंग्‍य - करोना काल में नौकरियों के खुलते द्वार


हास्‍य व्‍यंग्‍य
करोना काल में नौकरियों के खुलते द्वार   
                                                                                                                          -: सुनील सक्‍सेना   
                            
           आज बल्‍लू बहुत दिनों बाद छत पर दिखाई दिया ।  जनता कर्फ्यू में वो थाली,  घंटी,  शंख बजाने के लिए परिवार सहित छत पर आया था ।  उस दिन वो बड़ी शान से शंख फूंक रहा था,  पर बजा न सका ।  मैं उसकी पीड़ा को समझ गया था ।  दरअसल शंख बजाने के लिए आदमी का हाजमा सही होना जरूरी है । उस दिन के बाद जनाब आज नमूदार हुए । बल्‍लू थोड़ा दुबला और  चिंतित नजर आ रहा था ।
मैंने पूछा – क्‍या बात है बल्‍लू  तू कुछ टेंशन में लग रहा है... । तबियत पानी सब ठीक है न ?”
बल्‍लू बोला – सेहत-वेहत तो सब ठीक ही है यार मुझे तो अपनी नौकरी की चिंता खाये जा रही है ।   लॉकडाउन के बाद पता नहीं फेक्‍ट्री मालिक काम पर रखेगा भी या नहीं । पहले ही घड़ी-घड़ी छंटनी के नाम पर नौकरी से निकालने की धमकी देता रहता था । अब तो रसातल में चली गई अर्थव्‍यवस्‍था का सॉलिड बहाना है उसके पास । लगता है नौकरी से निकाल ही देगा ।
मैंने कहा – ओह.. ! तो तू नौकरी के चक्‍कर में दुबला हो रहा है । देख,  मैं तो पहले ही तुझसे कहता था कि जिंदगी में हमेशा दूसरा विकल्‍प तैयार रखना चाहिए । पर तू है कि इस लॉकडाउन में निठल्‍लों की तरह घर में पड़े-पड़े टीवी, मोबाइल पर समय बरबाद कर रहा है ।  अवसरों को भुनाना सीख बल्‍लू ।
बल्‍लू एकदम चटक गया । जैसे भजिए तलते वक्‍त गरम-गरम तेल का छींटा हाथ पर गिर गया हो । बोला – तूने कौनसी कोरोना की वेक्‍सीन ढूंढ ली इतने दिनों में । दिनभर जनानियों वाले काम करता है घर पर । एक दिन झाड़ू लगाता है तो फेसबुक पर फोटो डालता है । दूसरे दिन पोछा लगाता है तो व्‍हाटसएप पर स्‍टेटस डालता है । कपड़े धोता है तो इंस्‍टाग्राम पर फोटो चिपका देता है । तू ने कौनसा  तीर मार लिया लॉकडाउन में । बात करता हैबल्‍लू की खिसियाहट का सबब वो खबर थी जो पिछले कई दिनों से सुर्खियों में है कि आनेवाले समय में देश में  रोजगार घटेंगे और मनोरोगी बढ़ेंगे
मैंने कहा – तीर तो नहीं मारा प्‍यारे,  लेकिन इस लॉकडाउन में,   मैं पाक कला में पारंगत हो गया हूं । अब मैं रोटी ऐसी गोल-गोल बेलता हूं जैसे पूरनमासी का चांद । बरतन ! हाय.. हाय.. इतने साफ और चमकदार मांजता हूं कि आइना  भी रश्‍क करने लगे  । झाड़ू ? झाड़ू तो पूछो मत । ऐसी सफाई करता हूं जैसे कोई चतुर निष्‍णात चोर,  चोरी के समय घर के कोने-कोने पर हाथ साफ कर देता है ।  राई से कंकड़ ऐसे बीन कर अलग कर देता हूं जैसे हंस,  दूध और पानी को अलग कर देता है । मास्‍टर शेफ की तरह बगैर आंसू निकले बारीक प्‍याज खट- खट काट लेता हूं ।  
मेरी इन उपलब्धियों से  बल्‍लू की चिड़चिड़ाहट उसके चहरे पर साफ दिख रही थी । मन हुआ कि दो गज की लक्ष्‍मण रेखा को कुछ समय के लिए भूल जाऊं और मुंडेर फांदकर  कर बल्‍लू के पास  जांऊ ।  उसे समझाऊं कि जिन कामों को वो जनानियों वाले काम कह रहा है दरअसल वो हाउस कीपिंगकहलाती है ।  आनेवाले समय में संभावनाओं से भरा एक बड़ा बाजार है इसका । नौकरियां ही नौकरियां होंगी ।  
मर्द जब रसोई के काम करता है तो महाराज कहलाता है । इंसान के उदर में जबतक भूख की ज्‍वाला धधकती रहेगी, इसे शांत करने के लिए  महाराजाओं की जरूरत पड़ेगी ।  पाकशास्‍त्र में निपुणता भविष्‍य में मास्‍टर शेफ बनने के द्वार खोलेगी । जहां नेम फेम पैसा सब है ।  इन कामों को हिकारत की नजर से न देख बल्‍लू । अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है । आत्‍मनिर्भर होजा । पर मैं कुछ कह पाता तब तक  बल्‍लू  खिसक लिया । टीवी पर पुरषार्थ और परमार्थ  की महाभारतचालू हो गई थी ।  टीवी तो बल्‍लू का प्रिय शगल है, उसे  कैसे छोड़ सकता है ।

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