मंगलवार, 7 जुलाई 2020

व्‍यंग्‍य - बाबा का "पलटासन"




व्‍यंग्‍य
बाबा का "पलटासन"  
-: सुनील सक्‍सेना
                              बाबा मर्सडीज से भैयाजी के घर पहुंचे । चिंतित और हड़बड़ाए हुये थे । दरवाजे पर खड़े होकर टेर लगाई  कल्‍याण हो….” काई जवाब नहीं आया । कुछ पल रूककर बाबा ने आवाज को थोड़ा ऊंचा किया और कहा कल्‍याण हो….” इस बार बाबा की आवाज घर के अंदर पहुंच गई । जवाब आया । आगे जाओ बाबा…” बाबा इस अप्रत्‍याशित उत्‍तर को  सुनकर विचलित हो गये । इतने भी बुरे दिन नहीं आये हैं,  उनके कि खिड़की पर लगी चिलमन से झांके बिना ही कोई उन्‍हें आगे जाने के लिए कह दे ।
इस बार खालिस देशी और प्रचलित अंदाज में बाबा ने कहा- अरे कोई है घर में ?”
घर के अंदर से महिला स्‍वर में खीझते हुई आवाज आई – कहा न बाबा आगे जाओ यहां वैसे ही हालात खराब चल रहे हैं कुछ नहीं देने के लिए,  माफ करो…”
भैयाजी शवआसन में थे । बाबा ने बताया था कि जब मन अशांत हो, अपने ही मन की बात स्‍वयं को झूठी लगने लगे,  तकलीफें चारों ओर से घेर लें, लोग ऊपर से गरदन और नीचे से टांग खींचने लगें,  तो शुतुरमुर्ग की तरह गरदन को छुपाकर जमीन पर सपाट लेट जाओ या शवआसन में चले जाओ । बड़ा ही मुफीद नुस्‍खा है । इससे इम्‍यूनिटी बढ़ती है और विपत्तियों से पार पाने के लिए ऊर्जा भी मिलती है   कुछ जानी पहचानी आवाज सुन,  भैयाजी का ध्‍यान भंग हुआ  
अरे सुनती हो, कहां हो, देखो भई कोई कितनी देर से पुकार रहा है..”
रसोई घर से आवाज आई – “दो दिन से छींकें जा रहे हो, आज तो नाक भी बहने लगी है तुम्‍हारी, काढ़ा बना रही हूं ।  खुद ही उठकर देख लो कौन है  
भैयाजी ने दरवाजा खोला – अरे ! बाबा आप हैं ।  आइये आइये.. वो क्‍या है पिछले दो तीन महीनों से  मांगनेवाले कुछ ज्‍यादा ही आने लगे हैं ।  सो श्रीमती को लगा कि …”
पर ये तो सरासर अपमान है । हमसे..हमसे कह रहे हैं कि आगे जाओ । अरे,  हम तो वैसे ही बहुत आगे निकल गये हैं । अब और आगे जाने की गुंजाइश ही कहां छोड़ी आपने । बाबा ने नाराजगी भरे अंदाज में कहा ।
आप  पहेलियां न बुझाऐं अपने आने का प्रयोजन बतायें । क्षमा करें मेरे पास समय कम है । मेरी ऑनलाइन मीटिंग है । वेबनार में शिरकत भी करनी है ।भैयाजी ने दीवार घड़ी की ओर देखते हुए कहा ।   
बाबा मुद्दे पर आ गये,  कहने लगे – मैं तो बस  लोकल को  वोकल कर रहा था । संकट की इस घड़ी में देश का एक अच्‍छे नागरिक होने के नाते से बस थोड़ासा योगदान था मेरा ।
भैयाजी ने बाबा के हाथ में सेनिटाइजर डालते हुए कहा – बाबा आपके साथ एक बड़ी प्रॉब्‍लम है । आप हमेशा जल्‍दी में रहते हैं  जिन्‍हें जल्‍दी थी, वो जल्‍दी चले गये ।ट्रक के पीछे लिखा आपने पढ़ा  होगा ।  नहीं,  पढ़ा तो पढ़ा करिए । ट्रक के पीछे जीवन से जुड़ी बड़ी अच्‍छी-अच्‍छी  बातें लिखीं रहती हैं ।
बाबा गंभीर हो गये । कहने लगे – भैयाजी आप तो ठिठोली कर रहे हैं । जीवन की रक्षा करना तो परोपकारी कार्य है ।  मैंने क्‍या गलत किया ?अब आप ही बतायें,  मैं क्‍या करूं ?”
भैयाजी मीटिंग के लिए रेडी हो रहे थे । मुंह पर मास्‍क लगाते हुए बोले – देखिए ऐसा है , रायता तो आपने फैलाया है । अब आप ही इसे समेंटे ।
बाबा ने तुरंत पलटासन लगाया । लम्‍बी सांस खींची,  धीरे-धीरे सांस छोड़ते हुए कहने लगे – रायता ? कैसा रायता ? कौनसा रायता ? किसका रायता ? किस रायते की बात कर रहे हैं आप । मुझे तो रायता का रा भी नहीं मालूम है । भैयाजी,  मैंने कभी भी,  किसी भी प्रकार का कोई रायता बनाया ही नहीं तो, फैलाने का प्रश्‍न ही नहीं उठता । मैं ठहरा योगी, अल्‍पज्ञानी,  मैं क्‍या जानूं रायता-वायता । मेरा क्‍या लेना देना इस रायते से । मेरी भावनाओं को समझिये ।  
भैयाजी ने बाबा का ये रूप पहली बार देखा था । ऐसी पलटी तो भैयाजी ने भी अपने केरियर में कभी नहीं मारी । खरबूजा खरबूजे को देखकर रंग बदलने लगा  बाकी सब तो ठीक है बाबा आपके लच्‍छन ठीक नहीं लग रहे हैं.. आप अपने काम पर ही ध्‍यान दें, हमारे पेट पर लात मत मारना । भैयाजी बाबा को चेताकर लाइव हो गये ।
                                             ---000---

2 टिप्‍पणियां:

आपके विचार