शुक्रवार, 10 जुलाई 2020

हास्‍य व्‍यंग्‍य - जो डर गया समझो मर गया



हास्‍य व्‍यंग्‍य
जो डर गया समझो मर गया       
-: सुनील सक्‍सेना
                            दरवाजे पर खटखट की आवाज सुनाई दी ।  खटखट की आवाज अचानक भड़भड़ में बदल गई । मैंने दरवाजा खोला तो,  सामने  जोशी जी खड़े थे । मुझे देखते ही बोले – भाई साहब गजब हो गया । तेरह नंबर घर में तेंदुआ घुस गया है । जल्‍दी चलिए ।
 क्‍या बात करते हैं जोशी जी कॉलोनी में तेंदुआ ? किसने देखा कि तेरह नंबर में तेंदुआ घुसा है ?” मैं अचरज में था । तभी हमारे सुपुत्र भी आगये  । कहने लगे – “जोशी अंकल सही कह रहे हैं पापा । मल्‍होत्रा अंकल की बबली है न,  उसने अपनी बालकनी से देखा । हम चेटिंग कर रहे थे । बबली तो वीडियो लेने वाली थी, तब तक वो  नायर अंकल के घर में घुस गया ।
मैं इस विवाद में नहीं पड़ना चाहता था कि घर में कौन घुसा है । फिलहाल नायर दंपत्‍ती को किसी भी खतरे से बचाना मेरी प्राथमिकता थी । मैं जोशी जी के साथ हो लिया । श्रीमतीजी ने टोका –  ज्‍यादा तीसमारखं न बनिये । बाहर कोरोना है । ये लीजिए पहले मास्‍क पहनिए । सेनेटाइजर की शीशी रखलें । और हां जमघट न लगा लेना वहां ।अब तक तेरह नंबर घर के सामने भीड़ जमा हो गई थी ।
जंगलों पर कब्जा करके बस्तियां बनाओगे, तो ये एक दिन होना ही था…” ये पुरोहित साहब कह रहे थे, जो नगर निगम के अतिक्रमण अमले में पदस्‍थ हैं ।
तभी सुखलाल गार्ड ने कहा – वो तो ठीक है, सोचिए  करना क्‍या है ?”
 पहले तय कर लो कि तेंदुआ ही घुसा है या कोई और ? लॉकडाउन में घर में पड़े-पड़े सबका वजन बढ़ रहा है । हो सकता है बबली ने किसी मोटी तगड़ी बिल्‍ली को जाते हुए देखा हो, जिसे वो तेंदुआ बता रही है  गर्ग साहब ने डाउट क्रिएट कर दिया ।  
मल्‍होत्राजी पिनक गये – बबली अब बच्‍ची नहीं रही.. जवान हो गई है । एक पल में ताड़ लेती है अच्‍छी बुरी नजर को…. तेंदुए को नहीं पहचानेगी ।
इस बीच शुक्‍ला ने सुझाव दिया – तेंदुए को बाहर निकालने के लिए  कुछ बजाते हैं…”
मैंने पूछा – “बजाते हैं यानी ?”
वो बोले – “मतलब थाली, घंटी, शंख कुछ भी बजाइये । सब मिलकर बजायेंगे तो तेंदुआ घबराकर बाहर आ जायेगा ।
मैंने कहा – “आप कहना चाहते हैं कि हम सब यहां खड़े होकर थाली, घंटी, शंख बजायें तो तेंदुआ बाहर निकल आयेगा फिर हम लोगों  का क्‍या होगा ?
शुक्‍ला  बोला – “आप भी क्‍या बेवकूफों जैसी बात कर रहे हैं…”
शुक्‍ला तमीज से बात करो ।  किसको बेवकूफ कहा तुमने …?
अरे...अरे झगडि़ये मत । शुक्‍ला के कहने का मतलब है, जो भी बजाना है अपनी- अपनी  छत पर बजाओ । बालकनी से बजाओ । गुप्‍ता जी ने बीच बचाव करते हुए कहा 
सुखलाल का गार्ड कर्तव्‍य कुलांचे मार रहा था,  बोला –  जो भी करना है जल्‍दी करिए । समय निकलता जा रहा है ।
आप लोग यदि अनुमति दें तो मैं एक सुझाव दूं ?”  ये रस्‍तोगी था,  जिसने जिंदगी में कभी सोसायटी को  न होली का चंदा दिया न गणेश जी का,  आज फ्री फोकट में सुझाव दे रहा था ।
मैंने कहा जी कहिए ।
रस्‍तोगी बोला – “देखिये  मिस्‍टर एंड  मिसेज नायर अस्‍सी के पार हो गये हैं । पूरी जिंदगी जी ली है दोनों ने । अब उनके पास क्‍या बचा है देखने के लिए । हम लोग वैसे ही कोरोना से परेशान है । जरूरी है, हम सब सोशल डिस्‍टेंसिंग का ख्‍याल रखें और अपने-अपने घर जायें । पुरोहित साहब सब संभाल लेंगे । 
कुछ तो शर्म करो रस्‍तोगी । यानी जो उम्रदराज है,  तो उसे जीने का हक नहीं । लानत है ऐसी घटिया सोच पर । मैं आगे कुछ और कहता,  रस्‍तोगी चुपचाप से खिसक लिया  
सुखलाल की बैचेनी बढ़ती जा रही थी । उसने फिर दोहराया – समय निकला जा रहा है,  जो करना है जल्‍दी करिये…”
ठहरिए अंकल…”  मैंने पलट कर देखा,  चढ्ढा साहब का बेटा राहुल था ।
डरने से कुछ नहीं होगा । आप लोग दूर हटिये । मैं देखता हूं । राहुल ने नायर साहब के गेट पर लगी  कॉलबैल को दबाया ।  सब खामोश थे  । सन्‍नाटा । दरवाजा नहीं खुला । राहुल ने इस बार कॉलबैल के साथ- साथ  दरवाजा भी जोर-जोर से खट खटाया । नायर साहब ने दरवाजा खोला ।
नमस्‍ते अंकल….”
सॉरी बेटा थोड़ा टाइम लगा गेट खोलने में । अब कम सुनाई देता है । टीवी का साउंड फुल था । मैं और तुम्‍हारी आंटी  डिस्‍कवरी चेनल देख रहे  हैं । तुम्‍हें तो पता है,  वाइल्‍ड लाइफ इज माय फेवरेट । ये तुम्‍हारा सीरियल्‍स न्‍यूज में मजा नहीं है । दीज एनिमल आर द बेस्‍ट 
आप ठीक तो हैं न अंकल…?
यस बेटा…. ऑल इज वेल…”
सब अपने अपने घर चले गये ।  सुखलाल मुस्‍कुराया गब्‍बर सही कहता था - “जो डर गया समझो मर गया ।
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4 टिप्‍पणियां:

  1. हा हा हा संवाद शैली में लिखी पोस्ट पढ़ने में और भी ज्यादा रोचक लगती है | सुनील जी पोस्ट में एक फोटो जरूर डालिये वो आपके पोस्ट का थंबनेल बन जाएगा और पोस्ट की खूबसूरती भी बढ़ा देगा

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    1. आभार अजय जी । आपके सुझाव को अगली पोस्ट में अमल करता हूं ।

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  2. लेकिन वो तेंदुआ गया कहाँ, बबली ने देखा क्या। सच में यही स्थिति है। अफ़वाह, डर, बदनीयती सब भरपूर है आजकल। बहुत बढ़िया व्यंग्य।

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    1. धन्यवाद शबनम जी । आपकी प्रतिक्रिया और बेहतर लिखने का हौसला देती है ।

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