रविवार, 26 जुलाई 2020

हास्‍य व्‍यंग्‍य - आदमी के अंदरवाला जानवर




हास्‍य व्‍यंग्‍य
आदमी के  अंदरवाला जानवर   
-: सुनील सक्‍सेना
                               मैंने मेल खोली  तो देखा बलवंत के बेटे की शादी का  कार्ड है । दिमाग ठनका । देव तो सो गये हैं । देवों  ने तो डू नॉट डिस्‍टर्ब का बोर्ड टांग दिया है । अब तीन महीने तक नो शादी । नो बेंड बाजा बारात । खैर चलो ,  फाइनली बलवंत को बहू मिल ही गई ।  पर शादी का कार्ड वो भी मेल से । भई दो गज की दूरी ही तो मेंटेन करना है । हम कौन से परदेस में रहते हैं, एक ही शहर तो है  । घर आकर भी कार्ड दे सकता था । मैं उलझन में था कि ऐसी क्‍या विपदा आन पड़ी की बलवंत आनन फानन में बेटे की  शादी कर रहा है । 
श्रीमतीजी ने काढ़े का गिलास मुझे थमाया और लगीं पिनपिनाने -  सुबह हुई नहीं कि मोबाइल पर सीधे हाथ जाता है आपका ।
अरे ! देखो तो सही । बलवंत के बेटे का शादी का कार्ड आया है ।मैंने कहा
फंस गई होगी कोई मालदार पार्टी । दहेज के चक्‍कर में लड़का बुढ़ा गया । पर एक बात तो मेरी भी समझ नहीं आ रही है कि हम बलवंत के कबसे इतने करीब हो गये कि हमें निमंत्रण भेजा है ।
श्रीमतीजी का सोचना सही था । सरकार ने बराती-घराती मिलाकर पचास का कोटा फिक्‍स कर दिया है ।  यानी हम पचास में शामिल थे । मन खुशी से उछालें मारने लगा मानो फोर्ब्‍स पत्रिका के द्वारा जारी टॉप फिफटी घनिष्‍ट मित्रों की सूची में हमारा नाम आ गया हो ।
वेडिंग कार्ड डाउनलोड किया तो दर्शानाभिलाषी में  बेटी दामाद के नाम के साथ एक नाम रॉकीलिखा था । जहां तक मुझे मालूम है बलवंत के एक बेटा और एक बेटी है । बेटी की शादी होगई है और उसके बेटे का नाम मेले मामा की शादी में जलूल-जलूल आना में दिख रहा था । पर दर्शानाभिलाषी में ये रॉकीनाम मेरे लिये अपरिचित था ।
यार ये रॉकी कौन है ?”  मैंने काढ़े का सिप लेते हुए श्रीमतीजी से पूछा  
श्रीमतीजी ने कंधे उचकाये और बुरासा मुंह बनाते हुऐ बोलीं -  पता नहीं..”
            चंदा । चंदा हमारी कामवाली बाई है । मल्‍टी फंक्‍शनल है । सबकी खबर ले और सबकी खबर दे । सदैव चौकन्‍नी । मुस्‍तैद । मुसाद के सीक्रेट एजेंट की तरह आंख कान सब खुले रखती है । मेरे प्रश्‍न का उत्‍तर दन्‍न से चंदा ने दिया   - रॉकी, बलवंत  साहब के कुत्‍ते का नाम है ।
मैं चौंका कुत्‍ते का नाम स्‍वागतातुर में   हद हो गई । ठीक है बलवंत को प्‍यारा होगा रॉकी से, पर अतिथियों का स्‍वागत,  वो भी कुत्‍ते से   
चंदा ने बलवंत और रॉकी के याराने का रहस्‍य खोलते हुए बताया -  बलवंत साब भौत मानते हैं रॉकी को । पूजा पाठ हो, बर्थडे हो,  होटल में पार्टी हो रॉकी के बिना कोई प्रोग्राम नहीं होता ।  घर का मेम्‍बर  है रॉकी  
 हाउस मेडस के पास हर घर की जन्‍मकुडली होती है । चिडि़या घर में कौन शेर है कौन बिल्‍ली है कौन उल्‍लू है, इन हाउस मेडस को पूरी जानकारी होती है ।
मैं बलवंत के रॉकी के प्रति अगाध प्रेम पर कुर्बान हो गया । जानवर का ऐसा मानवीकरण मैंने पहले कभी न देखा न सुना ।  मुझे अचानक युधिष्‍ठर और उनका श्‍वान याद आ गये, जिसे वे अपने साथ स्‍वर्गलोक तक ले गये थे, पर इंद्र ने एंट्री नहीं दी ।  
शादी के कुछ दिनों बाद बलवंत की एक और  मेल आई । खोला तो शोक संदेश था । नई नवेली बहू के उठावने का संदेश । इस बार शोक संदेश में रॉकी का नाम नदारद था ।
मुझे सीक्रेट एजेंट चंदा का इंतजार था । मेरे मुंह से बलवंत शब्‍द निकला ही था,  चंदा बताने लगी- बहू कैसे मरी मालूम नहीं साब । जितने मुंह उतनी बातें.. घर में बहू से रोज  झगड़ा होता था कोई  ऊंचे मॉडल की कार चाहिए थी,  बलवंत साब के बेटे को । अब आदमी को जानवर बनने में टैम  कहां लगता है साब । एक रात ऐसी सोई कि फिर उठ नहीं  । उसी दिन रॉकी घर छोड़कर चला गया ।
मेरे कानों में उस मनहूस रात कुत्‍ते के रोने  की आवाज गूंजने लगी । शायद  रॉकी ही था । कहते हैं कुत्‍ते  मौत की आहट सुन लेते हैं । उन्‍हें यमराज दिखने लगते हैं । मौत की आहट सुन लेते हैं वो । पर बोल नहीं सकते । काश कोई सुन लेता रॉकी की आवाज । है न अजब तमाशा । बंदर से इंसान बने हम । जानवर ने सीख ली इंसानियत हमसे ।  हमारे अंदर का जानवर अभी तलक जिंदा है, मरता ही नहीं ।
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