एक अंतहीन यात्रा का अंत
-: सुनील सक्सेना
वो और उसका कुत्ता शेरू दोनों को पैदल
चलते-चलते आज पांच दिन हो गये थे । शहर में काम धंधा सब बंद हो गया । पैसे खत्म ।
सेठ से मांगे तो बोलता है गांव वापस चला जा ।
मुसीबत में दया, कृपा, रहम सब बेवफा हो जाते हैं । पुलिस कहती है घर में बैठ नहीं तो कोरोना लग
जायेगा । वो सोचता, कोरोना तो तब लगेगा
जब मैं बचुंगा । गरीब को तो बस “भूख” लगती है, जिसके लिए हजारों मील अपना गांव छोड़कर वो इस शहर में
आया था । मुनादी हो रही थी- जो जहां हैं, वहीं रहें । घर में रहें, सुरक्षित रहें । जान है तो जहान
है । उसने पहली बार बड़ी शिद्दत से महसूस
किया बस जान ही उसकी है, जहान तो सिर्फ कहने के लिए है ।
अब मरता क्या न करता । उस दिन
भीड़ के साथ वो भी अपने गांव के लिए निकल पड़ा । भगदड़ और भागमभाग में जो कुछ घर
में था, उसने थैले में डाल लिया था । कुछ चने,
बची हुई रोटियां और बिस्कुट शेरू
के लिए । वो शेरू को शहर में ही छोड़कर निकलने वाला था । जानता था कि खुद उसका ही
कोई ठिकाना नहीं, शेरू को लिए कहां-कहां भटकेगा । शेरू उसके सुख-दुख में
हमेशा साथ रहा है । जानवर है , लेकिन वफादार है । पीछे लग गया उसके । छोड़े ही न । वो माइलस्टोन
जिस पर उसके गांव का नाम लिखा है, मालूम नहीं और कितनी दूर है । बस वो दोनों तो निकल पड़े ।
दोनों
भूखे थे । हाइवे पर खाने के पेकेट बंट रहे थे । चार पूड़ी और आलू की सब्जी । एक पेकेट
उसने ले लिया । दूसारा शेरू के लिए, उसने हाथ बढ़ाया तो आदमी बोला – “एक दिया न तुझे… चल आगे बढ़.. कुत्ते बिल्लियों के लिए खाना
नहीं है ।” वो चुपचाप लाइन से हट गया । जो मिला वो काफी था । पता नहीं अब कब खाना नसीब
होगा ।
सड़के
सूनसान थीं । पिछले सात दिनों से सड़क पर उसे न बस, ट्रक, कोई गाड़ी नहीं दिखाई दी थी ।
अचानक एक साथ कई बसों के हॉर्न सुनाई दिये । उसने पलट कर देखा एक दो नहीं बसों की लम्बी
लाइन थी, जो उसके गांववाले रास्ते पर जा रही
थीं । वो शेरू को लेकर सड़क के बीचोंबीच
खड़ा हो गया । “बस रोको भैया.. रोको.. ।” बसों में लड़के-लड़कियां थे ।
सोशल डिस्टेंसिंग को फॉलो कर रहे थे । एक सीट पर केवल एक । साधन सम्पन्न परिवारों के विस्थापित
विद्यार्थी थे । विस्थापित तो वो भी था ।
बस रूकी । कंडक्टर चिल्लाया- “मरना है क्या ?
बीच सड़क में खड़ा है…”
“भैया हमें भी बिठालो बस में ।
बलरामपुर उतर जायेंगे ।”
“यहां पैर रखने तक की जगह नहीं तू
कुत्ते के साथ बैठेगा … चल हठ ” कंडक्टर ने भद्दी गाली भी दी ।
एक-एक करके सारी बसें
रसूखदार घरों के चिरागों को लेकर
निकल गईं । वो और शेरू फिर चल दिये । अंतहीन यात्रा पर । थक गये थे दोनों । एक-एक कदम भारी पड़ रहा था । शेरू
सड़क पर पसर गया । उसकी आंखें बंद । जीभ बाहर । शेरू मर गया था, और इंसानियत, वो तो कब की मर चुकी थी ।
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अच्छी सामवेदनशील कहानी हालाँकि मर चुकी है संवेदनशीलता आज फिर से ।..
जवाब देंहटाएंशुक्रिया महोदय
हटाएंयतार्थ को दर्शाती मार्मिक लघुकथा
जवाब देंहटाएंराजीव जी बहुत बहुत धन्यचवाद
हटाएंयथार्थ चित्रण ।
जवाब देंहटाएंआभार
हटाएंसमसामयिक रचना
जवाब देंहटाएंधन्यावाद
हटाएंइंसान जानवरों का फर्क मनुष्य को यही नजर आता है ,दुख पर दुख ,सामाजिक तस्वीर को बखूबी खींचा है
जवाब देंहटाएंशुक्रिया
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