शुक्रवार, 19 जून 2020

व्‍यंग्‍य - शापग्रस्‍त साइकलें





व्‍यंग्‍य
शापग्रस्‍त साइकलें
-: सुनील सक्‍सेना
                              फेक्‍ट्री बंद थी । महामारी ने कारखाने के दरवाजे हमेशा के लिए बंद कर दिये थे और बदनसीबी का ताला जड़ दिया था । अच्‍छे दिन वाली  चाबी न जाने कहां खो गई थी ।   गोडाउन में घुप्‍प अंधेरे में कई दिनों से निर्विकार पड़ी साइकलें बैचेन थीं  । छटपटा रही थीं । महीनों से  निष्क्रिय पड़-पड़े उनके अंग-अंग में जंग लग गया था । अभागिन साइकलें असहनीय पीड़ा से गुजर रही थीं । अतीत उनकी फौलादी मजबूती का साक्षी था, परंतु आधुनिकता ने साइकलों के अभेद्य किले को नेस्‍तनाबूद कर दिया था । साइकलें अपने अस्तित्‍व के लिए संघर्ष कर रही थीं,  इस उम्‍मीद में कि कभी तो उन्‍हें इस तिरस्‍कृत जिंदगी से निजात मिलेगी ।
तभी  मर्मांतक पीड़ा से भरी आवाज   सुनाई दी  कोई है यहां जो मुझे सुन सकता है ।  मैं सांस नहीं ले पा रही हूं…. मेरा दम घुट रहा है । मुझे बाहर निकलो प्‍लीज । ये लेडीज साइकल का स्‍वर था । जो  कभी पिंक कलर की हुआ करती थी, परंतु  बुरे दिनों की कालिमा ने उसे बदरंग कर दिया था । एक वक्‍त था, जब मार्केट में इसकी बड़ी डिमान्‍ड थी । बदलते जमाने की बदलती तस्‍वीर ने उसका नूर छीन लिया ।
वहीं पास में पड़ी आधी- अधूरी बनी, जेंटस साइकल ने कहा – घबराओ नहीं । ये वक्‍त है । वक्‍त कभी ठहरता नहीं है । मेरा मन कहता है,  ये वक्‍त भी गुजर जायेगा ।
पिंक साइकल भावुक हो गई, बोली – मन की बात मत करो । हकीकत से कब तक मुंह छुपाओगे ।  हम इतिहास में दर्ज होने जा रहे हैं । हम मनुष्‍य के जीवन संघर्ष गाथा का हिस्‍सा थे कभी  । कितने गर्व से कहता था वो, हम साइकल से मीलों दूर पढ़ने जाते थे, मोहल्‍ले में उसका रूतबा था, क्‍योंकि पूरे मोहल्‍ले में अकेले उसके पास  साइकल थी । जो सक्षम नहीं थे,  वे हमें कुछ घंटों के लिए किराये पर लेकर खुश हो जाते थे । कितनी ही प्रेम कहानियों का बिसमिल्‍लाह स्‍कूल-कॉलेजों में हम साइकलों ने  किया । साइकल की चेन उतर जाने के बहाने, प्रेमी युगलों में संवाद हमने ही शुरू करवाया । ऐसी मुख्‍तसर मुलकातों से न जाने कितनी मोहब्‍बतों  की दास्‍तानें  मुकम्‍मल हुईं । ये सारी बातें अब  किस्‍से- कहानियों में याद की जायेंगी । झूठी दिलासा  मत दिलाओ । 

आधी-अधूरी साइकल ने ढांढस बंधाते हुए कहा – पगली ये बाजार है । सब्र कर हम फिर लौटेंगे ।
ये भ्रम है तुम्‍हारा । जब यौवन का ताब ठंडा पड़ जाता है, तो बाजार में उसका कोई खरीददार नहीं मिलता है । हम कब तक अपने पुराने चेहरे के साथ इस क्रूर  बाजार में घूमते रहते । ये तो एक दिन होना ही था । वो साइकलें खुश किस्‍मत थीं, जिन्‍हें मालिक ने अपने पापों के प्रयाश्चित के एवज में दान कर दिया । उनके नसीब में खुली हवा खुली सड़क सब कुछ था, जिसके लिए वो बनीं थीं । पर हमारी अकाल मौत निश्चित है ।
आधी-अधूरी साइकल,  मृत्‍यु को नजदीक जानकार दार्शनिक होगई उसने कहा – हिम्‍मत रख  जिसने हमें बनाया है, वो ही हमें पार लगायेगा ।
वो जिसने हमें बनाया था, कब का ये शहर छोड़कर अपने गांव चला गया । मूर्ख हो तुम जो आस लगाये बैठे हो कि वो लौटेगा । कितना असहाय और बेबस था वो ।  गिड़गिड़ा रहा था दाल रोटी और कुछ पैसों के लिए, पर मालिक ने उसकी एक न सुनी ।  भूखा प्‍यासा, खाली जेब निकल पड़ा वो न खत्‍म होने वाली यात्रा पर और पीछे छोड़ गया है, हम अभिशप्‍त साइकलों को….”  पिंक साइकल की सिसकियां गोदाम में गूंज रही थीं । एक सैलाब आया निरीह और असहाय  दिलों  से निकली हाय का,  और फेक्‍ट्री की दीवारें दरक गईं थीं ।
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7 टिप्‍पणियां:

  1. साइकल के सवार भूखे प्यासे ख़ाली जेब चले तो गए, पर उन्हें लौटना ही होगा, और कोई उपाय नहीं। फिर वे लौटेंगे, साइकिलों के दिन फिरेंगे। लेकिन पिंक साइकिलों के दिन न लौटेंगे। गाँव क़स्बों में ख़ूब जी चुकी ये। विचारणीय कटाक्ष। उत्तम लेखन के लिए बधाई।

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    1. धन्यवाद शबनम जी । इनशाअल्लाह वे जरूर लौटेंगे

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  2. शानदार पोस्ट ,साइकिल भी दुखी है ,

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