गुरुवार, 4 जून 2020

हास्‍य व्‍यंग्‍य - आत्‍मनिर्भर बनिए काम पर चलिए




हास्‍य व्‍यंग्‍य
आत्‍मनिर्भर बनिए काम पर चलिए
  
-: सुनील सक्‍सेना
                            भूखे-प्‍यासे । गिरते-पड़ते । पिटते-पिटाते । लुटते-लुटाते । अंतत: वो अपने गांव की सरहद पर पहुंच ही गया । उसने देखा वहां दो तम्‍बू गढ़े हुए हैं । एक में कोरोना की जांच हो रही है । दूसरे  में आत्‍मनिर्भर बनने के लिए पंजीयन चल रहा है । अब उसे चयन करना था कि गांव में प्रवेश करने से पहले वो कोरोना की जांच करवाये या आत्‍मनिर्भर बनने वाले लोगों की लाइन में लग जाये  । फाइनली उसने डिसाइड किया कि जब कोरोना के साथ ही जीना है,  तो क्‍यों न आत्‍मनिर्भर बनकर ही जंग में उतरा जाये । चुनांचे वो आत्‍मनिर्भर बनाने  वाली  लाइन में लग गया ।
उसका नंबर आया । शिविर में पंजीयन करने वाले कर्मचारी ने उससे पूछा -   आधार कार्ड है ?”
वो बोला -  हां हुजूर,  वो तो हमारे सीने से कर्ण के दिव्‍य कवच की भांति सदैव चिपका रहता है । बगैर आधार के हम जैसों का कोई आधार ही नहीं है हुजूर  । ये लीजिए ।
सरकारी कारिंदे  ने आधार कार्ड में लगे फोटो को गौर से देखा और चेहरे का मिलान करने लगा ।  उसने पूछा -  ये तुम्‍हारा ही फोटो है ? शक्‍ल तो मिलती नहीं तुम्‍हारी । जवानी फोटो की लगती है ।

वो बोला – ज्‍यादा पुराना नहीं है मालिक । ये फोटू हम तब खिंचवाये थे, जब हमारे बाप ने लतिया के हमें घर से बाहर निकाल दिया था, और हम अपने पांव पर खड़े होने के खातिर गांव छोड़कर शहर चले गये थे । अब क्‍या बतायें मालिक,  ये शहर बड़े बेदर्द और बेहरम होते हैं । हमने अपना खून पसीना बहाकर शहर का नक्‍शा बदल दिया । बदनसीबी देखिए हमारी साहब, हमने शहर की सूरत बदली और शहर ने हमारी सूरत बदल दी । भरी जवानी में बुढ़ा गये हम ।  इस फोटू में हम ही हैं, विश्‍वास करिए ।

उसका नाम पंजीयन सू‍ची में दर्ज हो गया । बड़े बाबू से हिचकिचाते हुए बोला – बुरा ने माने हूजूर तो एक बात पूछें ?
पूछो
हम कितने दिन में आत्‍मनिर्भर हो जायेंगे मालिक ?”
                कुछ कह नहीं सकते…” बड़ा बाबू बोला
फिर भी कोई तो टाइम लिमिट होगी हुजूर  । काहे से मालिक, हमारी तो पीढि़यां गुजर गई , कोई भी  आज तक आत्‍मनिर्भर नहीं हो पाया । कहते सब हैं, पर करता कोई नहीं ।
बड़े बाबू आत्‍मनिर्भर बनने की गाइड लाइन पढ़ने लगे, जो हाल ही में जारी हुई थी  । एक पेज पर रूक कर बोले – कम से पांच साल तो लगेंगे बाकी तुम्‍हारी मेहनत  पे डिपेंड करता है ।
 पांच साल ! पांच साल तो बहुत हो जायेंगे हुजूर । कोई तो स्‍कीम होगी जिससे हम एक-दो साल में आत्‍मनिर्भर हो जायें । आपके पास तो तमाम मॉडल हैं, प्‍लान हैं ।
बड़े  बाबू भड़क गये । कहने लगे- समय लगता है हर चीज में । अभी तो आत्‍मनिर्भर बनाने का आइडिया भ्रूण अवस्‍था में है । बच्‍चे को भी जन्‍म लेने में नौ महीने का समय लगता है । यहां तो एक सौ तीस करोड़ लोगों को आत्‍मनर्भिर बनाना है ।़
नाराज न हों  मालिक ।  बस एक कनफ्यूजन और दूर करदें बड़ी मेहरबानी होगी । इन पांच साल में हम कितने आत्‍मनर्भिर हो जायेंगे ?  मतलब फिफ्टी परसेंट, सेवेन्‍टी परसेंट या हंड्रेड परसेंट ?”
बड़े बाबू तल्‍ख लहजे में बोले – हंड्रेड परसेंट कोई आत्‍मनिर्भर नहीं होता है । न ही हम किसी को  हंड्रेड परसेंट आत्‍मनिर्भर बनाते हैं । एक बार आदमी हंड्रेड परसेंट आत्‍मनिर्भर हो जाये,  तो गर्राने लगता है । खलीफा हो जाता है । हां,  हम तुमको इतना सक्षम बना देंगे कि तुम्‍हें किसी दूसरे की जरूरत नहीं पड़ेगी ।
और मालिक खुदा न खास्‍ता कभी दूसरे को हमारी जरूररत पड़ जाये तो । नहीं.. मतलब हम ऐसे ही पूछे मालिक गुस्‍ताखी माफ हो ।
बड़े बाबू तमतमा गये । तुम हमको बेवकूफ समझे हो । सब आत्‍मनिर्भर हो जायेंगे तो हमारा डिपार्टमेंट ही बंद हो जायेगा । हमारे भी बीवी बच्‍चे हैं । सुना नहीं तुमने मैंने क्‍या कहा अभी, “पूर्ण आत्‍मनिर्भर हम किसी को नहीं बनाते हैं । इतनी गुंजाइश रखते हैं कि जब दूसरे को जरूरत पड़े तो  काम आ सको   
वो बड़े बाबू की गुगली में फंस गया था । उसने चुपचाप से पंजीयन की स्लिप ली और कोरोना की जांचवाली लाइन में लग गया ।
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8 टिप्‍पणियां:

  1. प्रश्नोत्तर जबरदस्त मजेदार पोस्ट ,मन नही भरा फिर से पढ़ना है ,बहुत ही बढ़िया

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  2. अच्छा व्यंग है और कितना सच भी है ... नेताओं के खेल का सिरा मिलना ही मुश्किल है ...

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  3. बहुत बहुत धन्यवाद दिगंबर जी

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  4. एक बार फिर बहुत ही बढ़िया

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  5. बहुत बहुत धन्यवाद ज्योति जी

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