सोमवार, 31 अगस्त 2020

कहानी - ‘रेनकोट ’

 

कहानी  

रेनकोट

-: सुनील सक्‍सेना

 

 रात को हल्‍की बूंदा-बांदी हुई । सुबह होते ही बारिश तेज हो गई । जब भी ऐसी बरसात होती है माया का दिल बैठने लगता है । वो बैचेन हो जाती है । लगता है जैसे प्राण गले में अटके हैं और अभी पखेरू बन उड़ जायेंगे ।  आज से ठीक दस साल पहले ऐसी ही बरसात थी । चंदन को स्‍कूल भेजना  जरूरी था । उसका साइंस ओलम्पियाड का टेस्‍ट था । राहुल ने मना भी किया था - कोई जरूात नहीं है चंदन को ऐसी बरसात में स्‍कूल भेजने की.. एक टेस्‍ट छूट गया,  तो कौनसा कैरियर चौपट हो जायेगा…”। पर माया ने ही जिद से चंदन को स्‍कूल भेजा । आज के जमाने में  सिर्फ मार्कशीट से ही योग्‍यता का आंकलन नहीं होता है । पढ़ाई के साथ एक्‍स्‍ट्रा केरीक्‍यूलर एक्टिविटी भी जरूरी है ।

 

 घर से सौ मीटर की दूरी पर ही स्‍कूल बस आती थी । छोटासा छाता । वाटरप्रुफ स्‍कूल बैग । रेनकोट । यानी बरसात से बचने के पुख्‍ता इंतजाम के साथ चंदन को स्‍कूल रवाना किया था । राहुल ऑफिस चले गये ।  माया के दो इम्‍पोर्टेंट  लेक्‍चर थे आज कॉलेज में । शांताबाई भी लंच डायनिंग टेबल पर लगा कर चली गई । माया मेनगेट लॉक कर रही थी, तभी  मोबाइल की घंटी बजी । मोबाइल पर्स में था । जब तक पर्स से मोबाइल निकाला,  घंटी बंद हो गई । देखा,  तो चंदन के स्‍कूल का नंबर था । माया रिडायल कर ही रही थी कि घंटी फिर बजी ।

 

हैलोमैं शारदा विद्यामंदिर से बोल रहा हूं ।  राहुल वर्मा हैं ।

जी नहीं वो नहीं है.. मैं उनकी वाइफ  बोल रही हूं ।

स्‍कूल बस नंबर 12 का शिवाजी चौक पर एक्‍सीडेंट हो गया है । आप फौरन चिरायु  हॉस्पिटल पहुंचे ।

 

आकाश में बादल गरजे । तेज बिजली चमकी । कहीं आसपास ही  गिरी होगी बिजली । माया अस्‍पताल पहुंची । अस्‍पताल में अफरा-तफरी मची थी । बच्‍चों की चीखें ।  मां-बाप की चीत्‍कारें  गूंज रहीं थीं । कोई बच्‍चे को गोद में लिए,  तो कोई कंधे पर लटकाये,  तो कोई पीठ पर लादे बदहवास से अस्‍पताल में इधर उधर भाग रहे थे । इमरजेंसी वार्ड में कदम रखने की जगह नहीं थी ।

 

तेज बारिश में कुत्‍ते को बचाने के चक्‍कर में ड्राइवर ने संतुलन खो दिया । स्‍कूल बस सामने से आ रहे डम्‍पर से भिड़ गई । टक्‍कर इतनी जबरदस्‍त थी कि बस का आधा हिस्‍सा बुरी तरह पिचक  गया था । बारह मासूम बच्‍चे काल के गाल में समा गये । इनमें चंदन भी था । चंदन के शरीर पर कहीं कोई  घाव नहीं था, बस सिर पर लगी अंदरूनी चोट जानलेवा बन गई ।  

 

पिछले दस बरस से चंदन की यादें माया की ममता के सागर से टकाराती हैं, लौटकर वापस नहीं जातीं । तूफान खड़ा कर देती हैं । घर में एक अजीबसी मुर्दानगी छायी रहती है । सब कुछ ठहर सा गया लगता है । चंदन की वो हर चीज जिसे देख माया विचलित हो जाती थी,  राहुल ने एक-एक कर घर से निकाल दी थीं । चंदन की साइकल । उसका क्रिकेट बेट । उसके कपड़े । उसके खिलौने, अब घर में कुछ भी नहीं था,  सिवाय एक  बॉक्‍स के जिसमें चंदन की स्‍कूल की ड्रेस, छाता और रेनकोट था, जिसे अंतिम बार उसने स्‍कूल जाते वक्‍त पहन रखा था ।

 

राहुल ने इन सालों में माया को खूब समझाया कि किसी के चले जाने से जीवन खत्‍म नहीं हो जाता है । जीवन चलने का नाम है । चंदन का और हमारा बस इतना ही साथ था । बीते हुए कल की कालिख से खूबसूरत वर्तमान को बदसूरत मत करो ।  पर चंदन की यादें, माया का  पीछा नहीं छोड़तीं । माया ने कॉलेज जाना बंद कर दिया । कॉलेज की नौकरी छूट गई । माया की जिंदगी घर की चार दीवारों में सिमट कर रह गई, जहां थीं चंदन की स्‍मृतियां और माया के कुछ  प्रिय उपन्‍यास,  जिन्‍हें वो न जाने अब तक कितनी बार पढ़ चुकी थी ।  

 

आज चंदन को गुजरे दस बरस हो गये । वैसी ही मूसलाधार बरसात चालू थी, जैसी उस मनहूस सुबह को हो रही थी ।  राहुल ने आज ऑफिस से छुट्टी ले रखी थी । राहुल ने रोज की तरह माया और अपने लिए मॉर्निंग टी बनाई । चंदन की पसंद की डिशेज घर में बनना बंद हो गई थीं । राहुल ने सोच लिया था आज वो इस सिलसिले को तोड़ेगा ।  चंदन को शांताबाई के हाथ का बना रवे का हलुआ अच्‍छा लगता था । सप्‍ताह में एक दिन चंदन का लंच बॉक्‍स  शांताबाई तैयार करती थी । राहुल ने आज ब्रेकफास्‍ट में माया के लिए यही सरप्राइज आइटम प्‍लान किया था ।  इंतजार था तो बस शांताबाई के आने का ।  वो  समय की पाबंद है । आंधी हो तूफान हो, टाइम से  आजाती है । 

 

सात बज गये । शांता अभी तक नहीं आई । आज लेट हो गई । माया ने घड़ी की ओर देखा ।

 

हां आज बरसात भी कुछ ज्‍यादा ही तेज है । तेज बारिश में शांता के घर में पानी भर जाताहै । हो सकता है इसलिए नहीं आ पाई हो । कोई बात नहीं आज का ब्रेकफास्‍ट इस खाकसार के हाथ का खाइये । राहुल ने चाय के खाली कप उठाये और किचन में चला गया ।

 

रवे का हलुआ तैयार था । राहुल ने माया को पुकारा- माया आज की सरप्राइज डिश रेडी है ।  प्‍लीज कम फास्‍ट ।  माया चंदन के कमरे थी । चंदन का बक्‍सा खुला था । वो अवाक बक्‍से में रखी चीजों को निहार रही थी । माया की आंखों की कोरे नम थीं ।

 

कमऑन माया चंदन की इन चीजों को और कब तक इस तरह संजोकर रखोगी । जब तक ये तुम्‍हारे पास हैं, चंदन को तुम भुला नहीं सकोगी । तुम्‍हें इनसे मुक्‍त होना होगा । जीवन की नौका में जब बीते हुए कल के दर्दनाक पलों का बोझ बढ़ जाये, तो उसे नाव से फेंक देना में ही समझदारी है । वरना नाव डूब जायेगी । चंदन की यादों का तुम्‍हें तर्पण करना होगा । चंदन की अकाल मौत से हमारे जीवन पर लगे इस ग्रहण को तुम्‍हें दूर करना होगा ।  बड़ी लम्‍बी जिंदगी है माया,  समझो, ट्राइ टू अंडरस्‍टेंड । माया ने बॉक्‍स बंद कर दिया और राहुल से लिपट गई । माया के गर्म आंसुओं से राहुल का सीना भीगने लगा ।

 

अगले दिन शांताबाई जब आई तो उसका चेहरा उतरा हुआ था । वो उदास थी । आते ही खामोशी से अपने काम में लग गई ।

 

कल क्‍यों नहीं आई शांता…?” माया ने पूछा ।

कुछ नहीं मेम साब छोटे बेटे संजू की तीन दिन से तबियत ठीक नहीं है । कल उसको तेज बुखार था । बरसात है न मेमसाब रोज भीगता हुआ जाता है स्‍कूल । घर में एक ही छतरी है,  वो ये ले जाते हैं । आप कुछ हेल्‍प करो न मेमसाब

 

बोल न…”  

मुझे कुछ एडवांस दे दो तो मैं संजू के लिए छतरी खरीद लूंगी । आप मेरी पगार में से काट लेना । बहुत पैसा खर्च हो गया संजू के इलाज में । 

 

माया ने राहुल की ओर देखा । राहुल को जैसे इसी घड़ी का इंतजार था ।  राहुल ने माया को देखा । आंखें कई बार जुबां का काम कर देती हैं । माया जान गई थी कि चंदन की यादों को विसर्जित करने का इससे बेहतर अवसर और क्‍या होगा । माया ने चंदन की अंतिम शेष स्‍मृतियों का बॉक्‍स शांताबाई को सौंप दिया जिसमें छतरी के साथ रेनकोट भी था ।

 

 

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