सोमवार, 1 जून 2020

कहानी - फिर लौटा आया परियों के देस में


कहानी
फिर लौटा आया परियों के देस में   
-: सुनील सक्‍सेना
मां मेरे बेटे सुयश के जन्‍मदिन पर नैनीताल आईं थीं ।  सालों बाद ऐसा अवसर आया कि मां हमारे साथ थी । मैंने मां से  न जाने कितनी बार कहा था कि नैनिताल की पोस्टिंग का ये मेरा आखरी साल है एक बार आप और बाबूजी आजाओ । हवा पानी बदल जायेगा । पर मां से अपनी देहरी नहीं छूटती और बाबूजी से अपनी मित्र मंडली । वो तो सुयश इस बार जिद पकड़ गया कि दादी आपको मेरे जन्‍मदिन पर आना ही पड़ेगा ।  दादी को बुलाने की ठान ली थी उसने । रोज दादी को विडियो कॉल करता था- दादी आओगी न मेरी बर्थडे पर वरना आपसे मेरी कट्टी हो जायेगी । मैं आपसे बात नहीं करूंगा किसी ने सही कहा है मूल से सूद ज्‍यादा प्‍यारा होता है..” । मां सुयश की मनुहार को टाल नहीं सकी ।
 सुयश का बर्थडे हम सबके लिए यादगार बन गया । इंदु ने ढेरसारी डिश बनाई थीं । बर्थडे में बच्‍चों ने खूब एंजॉय किया । मां जबलपुर घर वापस जाने वाली थीं । लॉकडाउन की घोषणा हो गई । बस बंद ।  रेल बंद । हवाई जहाज बंद । जाने का कोई साधन नहीं था । हम सब घर में कैद हो गये थे । मां हफ्ते भर का प्रोग्राम बनाकर आई थीं । जिस तरह से कोरोना संक्रमण की देश भर से खबरें आ रही थीं, लॉकडाउन खुलने की संभावना क्षीण थी ।  मां को रूकना पड़ा । मेरी तो खुशी का ठिकाना न था । पहले हॉस्‍टल और फिर नौकरी के लिए घर से बाहर  क्‍या निकला,  मां- बाबूजी का साथ ही छूट गया था । मां के साथ इन पलों को मैं जी भरकर,  जी लेना  चाहता था । कोरोना ने  दुख के भेस में मुझे मां के सानिध्‍य का सुख दिया था ।
एक अनोखी दिनचर्या हम सबकी हो गई थी । जिसकी कल्‍पना हमने कभी नहीं की थी । सुयश का स्‍कूल बंद ।  मेरा ऑफिस बंद । इंदु का सुबह से रात तक काम के चक्‍कर में चकरी की तरह घर में घुमते रहना बंद । मां ने भी अपने को एडजस्‍ट कर लिया था । सुबह की पूजा के बाद टीवी पर धार्मिक सीरियल देखकर उनका समय निकल जाता था । हमेशा वक्‍त की कमी का  रोना रोनेवाले हम लोगों के पास,  अब भरपूर समय था ।
मेरा वर्क फ्रॉम होम चालू हो गया । मन की तसल्‍ली के लिए था, ये घर से काम करने का फंडा । ऑफिसवालों ने  चौबीस घंटे की घेराबंदी कर रखी थी । कभी फोन, कभी डाटा तो कभी रिपोर्ट । यानी घर में भी एक पल के लिए  चैन नहीं । उस पर ये नाकेबंदी । आप घर के बाहर निकल नहीं सकते । कुछ दिन तो ये सब अच्‍छा लगा । परंतु अब शारीरिक और मा‍नसिक थकावट होने लगी थी ।
मुझे बोर्ड के लिए प्रजेंटेशन तैयार करना था । डेड लाइन थी । आज शाम तक किसी भी हालत में मुझे प्रजेंटेशन तैयार कर बॉस को मेल करना था । सुबह से नॉन स्‍टॉप लेपटॉप के सामने बैठे-बैठे मेरी आंखें भारी हो रही थीं । इंदु ने तीन-चार बार कॉफी बनाकर दी पर सर दर्द कम नहीं हो रहा था ।  मां सुबह से कई चक्‍कर मेरे कमरे में लगा चुकी थीं ।  मेरी व्‍यस्‍तता और बैचेनी को देखकर चुपचाप चली जाती थीं ।
क्‍या हुआ बेटा.. तबियत ठीक नहीं लग रही तेरी ?”  मां ने कमरे में प्रवेश करते हुए पूछा ।
कुछ नहीं मां बस थोड़ा सर दर्द है । काम का प्रेशर है । ठीक हो जायेगा । मैंने मां की चिंता को कम करने का प्रयास किया ।
चल अब बंद कर । बहुत हो गया तेरा काम । कुछ देर सुस्‍ता ले । मां ने मेरा हाथ पकड़ लिया और मुझे उठा दिया ।  
दो मिनिट रूक,  मैं तेरे सिर में तेल से मालिश कर देती हूं । तुझे आराम मिल जायेगा । मां ने कमरे में ही रखी तेल की शीशी उठा ली । मैंने  मां की गोद में अपना सिर  रख दिया । मां की तेल में डूबी उंगलियां  होले होले मेरे बोलों को सहलाने लगीं । मां के स्‍नेहिल स्‍पर्श से मेरा पूरा शरीर शीतल होने लगा । अथाह सागर जैसी शांति । बदन हल्‍का और हल्‍का होता चला गया, बिल्‍कुल रूई के मानिंद । नींद का एक झोंका मुझे बचपन की परियों वाले देस  में ले गया । आंख खुली तो देखा मां आंचल से अपने आंसू पोंछ रही थी । मैं मां की ममता से पूरा भीग गया था ।
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8 टिप्‍पणियां:

  1. ममता मयी पोस्ट सच में माँ, माँ ही होती है।

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  2. वास्तविक सुख का चित्रण... लॉकडाउन में कुछ लाभ हुआ हो या न हुआ हो मगर बहुत से परिवारों ने अपना पुराना स्वरूप फिर पाया है.

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  3. आत्मीय रिश्ते मन को सुकून देते है। बहुत अच्छी कहानी।

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