कहानी
फिर
लौटा आया परियों के देस में
-: सुनील
सक्सेना
मां
मेरे बेटे सुयश के जन्मदिन पर नैनीताल आईं थीं । सालों बाद ऐसा अवसर आया कि मां हमारे साथ थी । मैंने
मां से न जाने कितनी बार कहा था कि नैनिताल
की पोस्टिंग का ये मेरा आखरी साल है… एक
बार आप और बाबूजी आजाओ… । हवा पानी बदल
जायेगा… । पर मां से अपनी देहरी नहीं छूटती और बाबूजी से
अपनी मित्र मंडली । वो तो सुयश इस बार जिद पकड़ गया कि दादी आपको मेरे जन्मदिन पर
आना ही पड़ेगा । दादी को बुलाने की ठान ली
थी उसने । रोज दादी को विडियो कॉल करता था- “दादी आओगी न मेरी बर्थडे
पर… वरना आपसे मेरी कट्टी हो जायेगी । मैं
आपसे बात नहीं करूंगा ” किसी ने सही कहा है “मूल से सूद ज्यादा प्यारा होता है..” । मां सुयश
की मनुहार को टाल नहीं सकी ।
सुयश का बर्थडे हम सबके लिए यादगार बन गया । इंदु
ने ढेरसारी डिश बनाई थीं । बर्थडे में बच्चों ने खूब एंजॉय किया । मां जबलपुर घर वापस जाने वाली थीं । लॉकडाउन
की घोषणा हो गई । बस बंद । रेल बंद । हवाई
जहाज बंद । जाने का कोई साधन नहीं था । हम सब घर में कैद हो गये थे । मां हफ्ते भर
का प्रोग्राम बनाकर आई थीं । जिस तरह से कोरोना संक्रमण की देश भर से खबरें आ रही
थीं, लॉकडाउन खुलने की संभावना क्षीण थी ।
मां को रूकना पड़ा । मेरी तो खुशी का ठिकाना न था । पहले हॉस्टल और फिर नौकरी
के लिए घर से बाहर क्या निकला, मां- बाबूजी का साथ ही छूट गया था । मां के साथ इन पलों को मैं जी भरकर, जी लेना चाहता था । कोरोना ने दुख के भेस में मुझे मां के सानिध्य का सुख
दिया था ।
एक
अनोखी दिनचर्या हम सबकी हो गई थी । जिसकी कल्पना हमने कभी नहीं की थी । सुयश का
स्कूल बंद । मेरा ऑफिस बंद । इंदु का
सुबह से रात तक काम के चक्कर में चकरी की तरह घर में घुमते रहना बंद । मां ने भी
अपने को एडजस्ट कर लिया था । सुबह की पूजा के बाद टीवी पर धार्मिक सीरियल देखकर उनका
समय निकल जाता था । हमेशा वक्त की कमी का रोना रोनेवाले हम लोगों के पास, अब भरपूर समय था ।
मेरा “वर्क फ्रॉम होम” चालू हो गया । मन की तसल्ली के लिए था, ये घर से
काम करने का फंडा । ऑफिसवालों ने चौबीस
घंटे की घेराबंदी कर रखी थी । कभी फोन, कभी डाटा तो कभी
रिपोर्ट । यानी घर में भी एक पल के लिए चैन नहीं । उस पर ये नाकेबंदी । आप घर के बाहर
निकल नहीं सकते । कुछ दिन तो ये सब अच्छा लगा । परंतु अब शारीरिक और मानसिक
थकावट होने लगी थी ।
मुझे
बोर्ड के लिए प्रजेंटेशन तैयार करना था । डेड लाइन थी । आज शाम तक किसी भी हालत
में मुझे प्रजेंटेशन तैयार कर बॉस को मेल करना था । सुबह से नॉन स्टॉप लेपटॉप के
सामने बैठे-बैठे मेरी आंखें भारी हो रही थीं । इंदु ने तीन-चार बार कॉफी बनाकर दी
पर सर दर्द कम नहीं हो रहा था । मां सुबह
से कई चक्कर मेरे कमरे में लगा चुकी थीं । मेरी व्यस्तता और बैचेनी को देखकर चुपचाप चली
जाती थीं ।
“क्या हुआ बेटा.. तबियत ठीक नहीं लग रही तेरी ?” मां ने कमरे में प्रवेश करते हुए पूछा ।
“कुछ नहीं मां बस थोड़ा सर दर्द है । काम का प्रेशर है । ठीक हो जायेगा ।” मैंने मां की चिंता को कम करने का प्रयास किया ।
“चल अब बंद कर । बहुत हो
गया तेरा काम । कुछ देर सुस्ता ले ।” मां ने
मेरा हाथ पकड़ लिया और मुझे उठा दिया ।
“दो मिनिट रूक, मैं तेरे सिर में तेल से मालिश कर देती हूं ।
तुझे आराम मिल जायेगा ।” मां ने कमरे में ही रखी तेल की शीशी उठा
ली । मैंने मां की गोद में अपना सिर रख दिया । मां की तेल में डूबी उंगलियां होले होले मेरे बोलों को सहलाने लगीं । मां के स्नेहिल
स्पर्श से मेरा पूरा शरीर शीतल होने लगा । अथाह सागर जैसी शांति । बदन हल्का और
हल्का होता चला गया, बिल्कुल रूई के
मानिंद । नींद का एक झोंका मुझे बचपन की परियों वाले देस में ले गया । आंख खुली तो देखा मां आंचल से अपने
आंसू पोंछ रही थी । मैं मां की ममता से पूरा भीग गया था ।
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good
जवाब देंहटाएंधन्यवाद कीर्ति जी
हटाएंममता मयी पोस्ट सच में माँ, माँ ही होती है।
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत धन्यवाद पल्लवी जी
हटाएंवास्तविक सुख का चित्रण... लॉकडाउन में कुछ लाभ हुआ हो या न हुआ हो मगर बहुत से परिवारों ने अपना पुराना स्वरूप फिर पाया है.
जवाब देंहटाएंशुक्रिया कुमारेन्द्र जी
हटाएंआत्मीय रिश्ते मन को सुकून देते है। बहुत अच्छी कहानी।
जवाब देंहटाएंआभार शबनम जी
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